मैं ये विडियो-सीरीज़ क्यों बना रहा हूँ? । पाकिस्तान की स्थापना ।

#ख़ून_से_लेंगे_पाकिस्तान ।
#पाकिस्तान_की_स्थापना ।
#हिन्दू_सिख_क़त्लेआम ।

इस विडियो के ख़ास नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* मुझे यह सवाल पूछा गया है कि क़याम-ए-पाकिस्तान पर, पाकिस्तान की स्थापना पर मैं वीडिओज़ क्यों बना रहा हूँ, जबकि मैं तो सिर्फ़ धर्म की बात करने वाला आदमी हूँ।

* पाकिस्तान की बुनियाद ही मज़हब के नाम पर रखी गई थी। धर्म जोड़ता है। सियासत तोड़ती है। लेकिन लोगों को एक-दूसरे से तोड़ने वाली सियासत ख़ुद मज़हब का या धर्म का नक़ाब पहन लेती है। अपने ही बाप को किले में क़ैद कर के, अपने ही भाइयों के क़त्ल करके तख़्त पर बैठा औरंगज़ेब सियासत है। अपने उसूलों पर क़ायम रहते हुये अपना सिर भी कटा देने वाला सरमद धर्म है।

* ऐसा क्यों है कि भारत में भी और पाकिस्तान में भी 1947 के क़त्लेआम के ज़िम्मेदार लोगों की निशानदेही करने से बचा जाता रहा है? आख़िर वो लोग कौन थे, जो बेगुनाहों के क़त्ल कर रहे थे? वो लोग कौन थे, जो अग़वा और बलात्कार कर रहे थे? जो लुटेरे थे, वो आख़िर कौन लोग थे? और सबसे ज़रूरी बात, आख़िर यह क़त्लेआम किये ही क्यों गये थे?

* तवारीख़ को इस लिये नहीं लिखा जाता कि दूसरों को इलज़ाम दिया जाये, बल्कि तवारीख़ तो इसलिये लिखी जाती है कि हम उससे कुछ सबक़ हासिल कर सकें। अगर तवारीख़ को ग़लत तरीके से लिखा जायेगा, तो ऐसी तवारीख़ से हासिल सबक़ भी ग़लत ही होंगे। ये ग़लत सबक़ हमें फिर से ग़लत राहों पर डाल देंगे।

* तवारीख़ के उस दौर में न नेहरू जी का कोई मरा, न जिन्नाह साहिब का। लेकिन जो तवारीख़ लिखी गई, वो या तो नेहरू वालों ने लिखी, या जिन्नाह वालों ने। जो मरे, जो लुटे, जो उजड़े, जो यतीम हुये, उनकी तवारीख़ तो अलग है। मैं तो इन्हीं मज़लूमों के नुक़्तानिगाह से बात करता हूँ। सियासत को दरकिनार करके, मज़हबी चश्मे को अपनी आँखों से हटा कर, कोई उन लाखों मज़लूमों को इन्सानियत के नज़रिये से भी तो समझे।

* जो लोग उस दौर में मुसलमानों को चुन-चुन कर मार रहे थे, उनके वारिसों में से अब किसी को हिन्दू अच्छे नहीं लगते, किसी को सिख अच्छे नहीं लगते। उस दौर में जो सिखों का क़त्लेआम कर रहे थे, उनके वारिस आज के सिख को समझा रहे हैं कि हिन्दू तुम पर ज़ुल्म कर रहा है। हिन्दू को कहा जा रहा है कि हर सिख खालिस्तानी है, हिन्दुओं का दुश्मन है। हिन्दुओं में कई और जोगिन्दर नाथ मण्डल पैदा करने की कोशिशें हो रही हैं।

* उन्हीं लोगों के वारिस ही तो हैं ये सब, जो ऐसा कर रहे हैं। नसल ही बदली है। उनकी रगों में बहती नफ़रत वही है। इनके पास भी मज़हबी जनून की वही आँखें हैं, जो इनके बड़ों के पास थीं। इनके लहू में बहती नफ़रत इन्हें ऐसा बना चुकी है कि यह मुहब्बत कर ही नहीं सकते। जिनको ज़हर अच्छा लगता है, उनको अमृत बुरा ही लगेगा।

उनका जो फ़र्ज़ है, वो अहल-ए-सियासत जानें,
मेरा पैग़ाम मुहब्बत है, जहाँ तक पहुँचे।

पाँचवाँ और आख़री भाग – ज़िला हज़ारा में हिन्दुओं-सिखों का क़त्ल-ए-आम । पाकिस्तान की स्थापना ।

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इस विडियो के ख़ास नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* पसाला गांव में सिखों और मुसलमानों की एक मीटिंग हुई। इसमें यह बात कही गई कि इलाके में अमन कायम रखा जाये, आपसी भाईचारा कायम रखा जाये। सभी सिख इस मीटिंग में हुई बातों से सहमत होकर अपने-अपने घरों की तरफ़ चले गये।

* लेकिन उसी वक़्त एक दूसरी मीटिंग बागण गांव में हो रही थी, जिसमें हमलावरों ने मीटिंग में शामिल लोगों को भड़काया कि इलाके के सभी सिखों को कत्ल कर दिया जाना चाहिए। बहुत लोगों ने वहां पर यह कसमें उठाई कि किसी भी सिख को ज़िन्दा नहीं छोड़ा जायेगा।

* भाटा गांव पर हज़ारों की तादाद में दंगाइयों ने हमला कर दिया। उन्होंने गांव को चारों तरफ़ से घेर कर सिखों के घरों में आग लगा दी। एक सिख प्रीतम सिंघ को हमलावरों ने उनके सीने में कई गोलियां मार कर उनको वहीं शहीद कर दिया। गोलियों की आवाज़ सुनकर एक बहुत बुजुर्ग सिख बाहर निकले, तो हमलावरों ने उन पर भी गोलियां चलाईं। उनकी भी वहीं शहादत हो गई। धर्म सिंघ, ग़रीब सिंघ और आसा सिंघ भी मुक़ाबला करते हुए गोलियों का निशाना बना दिए गये। एक सिख औरत भी गोलियों से ही शहीद हुई।

* अलग-अलग घरों में बंद 100 से भी ज़्यादा सिख चारों तरफ़ से आग में घिरे हुए थे। उनमें से कोई भी अगर बाहर निकलता था, तो गोलियों का निशाना बना दिया जाता था। भाटा गांव के इस क़त्ल-ए-आम में कुल 124 सिख शहीद हुये।

* भाटा में 124, सेहर गांव में 12, बडगर में 5, काला पानी गांव में 1, और जासा में 7 लोगों को क़त्ल किया गया। इस तरह इन गांवों में कुल 149 हिन्दुओं-सिखों के क़त्ल हुये।

* दिसम्बर 1946 के आख़िर और जनवरी 1947 की शुरुआत में हवेलियाँ और आस-पास के इलाकों में ऐसे हालात हो चुके थे कि हिन्दुओं और सिखों का वहाँ रुके रहना लगभग न-मुमकिन हो गया। लगभग सभी सिख और हिन्दू अपने घरों को छोड़कर या तो refugee camps में जा चुके थे, या वो हज़ारा ही छोड़कर पंजाब चले गये थे।

* कुछ महीनों के बाद कुछ हिन्दू और सिख हालात बदलने पर फिर वापिस अपने घरों को लौटे। उनको उम्मीद थी कि हालात पूरी तरह से सुधर जायेंगे। इन बदकिस्मत हिन्दुओं और सिखों के क़त्ल-ए-आम का एक और दौर अगस्त 1947 के आख़िर में फिर चला। गाँवों में रह रहे इका-दुका हिन्दुओं और सिखों को चुन-चुन कर बेरहमी से क़त्ल किया गया। उनको घरों को लूट लिया गया और जला दिया गया।

* पूरे हज़ारा में हिन्दुओं और सिखों के क़त्ल-ए-आम के सबसे खौफ़नाक वाकियात में से एक हरीपुर में 26 अगस्त, 1947 को हुआ था। हिन्दुओं और सिखों को उनके गले काटकर बहुत तड़पा-तड़पा कर क़त्ल किया गया। हिन्दू और सिख दुकानदारों के सिर काटकर उनकी दुकानों के बाहर टांग दिये गये।

* वाह के refugee camp से लगभग हर रोज़ या दो दिन छोड़कर तकरीबन 2 या 3 हज़ार हिन्दू-सिख refugees को निकाल कर ट्रेन के ज़रिये भारत भेजा जाने लगा। जो किस्मत वाले होते थे, वो ज़िन्दा ही भारत पहुँच जाते थे। बाक़ी रास्ते में ही दंगाइओं के हाथों मारे जाते।

भाग चौथा – ज़िला हज़ारा में हिन्दुओं-सिखों का क़त्ल-ए-आम । पाकिस्तान की स्थापना ।

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इस विडियो के ख़ास नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* गांव कुटली के लगभग सभी हिंदू और सिख अपने घर छोड़कर अपना गांव छोड़कर घोड़ा गली चले गए। एक व्यक्ति तुलसाराम और एक औरत माता द्रोपदी को क़त्ल कर दिया गया। द्रौपदी की एक शादीशुदा बेटी भी थी, जिसको गुंडे अग़वा करके ले गये।

* इलाके के एक और गांव लोरा में कन्हैया सिंह, पण्डित गोपाल चन्द की बीवी श्रीमती छत्तो, और दलीप सिंघ का हमलावरों ने क़त्ल कर दिया।

* ख़ूबसूरत वादी में हरो नदी के किनारे एक गांव सतोड़ा बसा हुआ है। यहां तक़रीबन 55 हिन्दू और सिख ख़ानदान रहते थे। पुलिस ने हिंदू और सिक्खों परिवारों को घोड़ा गली पहुंचा दिया।

* एक और गाओं था, ओगल। बेलीराम इस्सर और उनका परिवार तीन दिन तक अपने गांव ओगल में ही छुपे रहे। जब यह बात किसी दूसरे गांव में रहने वाले उनके एक मुस्लमान दोस्त को पता चली, तो उसने ओगल पहुँच कर बेलीराम और उनके परिवार को वहां से निकालकर अपने घर में पनाह दी।

* तरोड, कमार बगला, नलोई और संधा की बस्तियों के हिंदुओं और सिखों ने संधा बस्ती के साथ वाली एक ऊंची पहाड़ी पर जा कर पनाह ले ली। जब सैकड़ों की तादाद में दंगाइयों ने इस पहाड़ी पर पनाह लिए बैठे हिंदुओं और सिखों पर हमला करने की कोशिश की, तो सिखों ने उनका मुकाबला करने के लिए फायरिंग की और तोबड़े से भी कुछ गोले दागे। इससे दंगाइयों में ख़ौफ़ पैदा हो गया और उन्होंने पहाड़ी के ऊपर पनाह लिए बैठे हिंदुओं और सिखों के नज़दीक जाने की हिम्मत नहीं की। इन घिरे हुये सभी हिन्दुओं और सिखों को पुलिस की मदद से वहां से निकाल कर काकुल के रिफ्यूजी कैम्प में पहुंचाया गया।

* उस वक़्त की तहसील हरिपुर में एक गांव छजियां पर हमला करके हमलावरों ने हिन्दुओं और सिखों को मारना शुरू किया। अपनी जानें बचाने के लिए कोई 35 से 40 के बीच लोग एक घर के अंदर इकट्ठे हो गये। हमलावरों ने इस घर को चारों तरफ़ से आग लगा दी, जिससे यह सभी लोग, जिनकी तादाद 35 से 40 के बीच में थी, ज़िन्दा ही जल कर मर गये।

* तहसील के ही एक और गांव खाँनपुर के तीन लोग अपने काम के सिलसिले में तहसील दफ़्तर में आए हुये थे। ये तीनों बदकिस्मत दंगाइयों के हाथ आ गए और उनको बहुत बेरहमी से हरिपुर में ही क़त्ल कर दिया गया।

भाग तीसरा – ज़िला हज़ारा में हिन्दुओं-सिखों का क़त्ल-ए-आम । पाकिस्तान की स्थापना ।

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इस विडियो के ख़ास नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* ओगी के बाज़ार पर हमला करके दंगाइयों ने पहले हिन्दुओं और सिखों की दुकानों को आग लगा दी और उसके बाद 5 हिन्दुओं और सिखों को क़त्ल कर दिया।

* कुछ हिन्दुओं और सिखों को उनको गांवों से निकालकर सुम इलाही मुंग में ठहराया गया था। दंगाइयों ने सुम इलाही मुंग पर हमला करके इनमें से 14 हिन्दुओं और सिखों को क़त्ल कर दिया। 27 हिन्दू और सिख इस हमले में ज़ख़्मी हुये।

* जल्लो गांव में भी हिन्दुओं और सिखों के क़त्ल हुये। गुरुद्वारा साहिब को आग लगा दी गयी।

* 26 दिसंबर 1946 को 3 सिखों का क़त्ल हुआ। काहन सिंह और लहणा सिंह दोनों जीजा-साला थे। वो काहन सिंघ की 9-10 साल की बेटी बलबीर कौर को उसके ससुराल गांव धराड़ी से उसके मायके के गांव धणकां लेकर जा रहे थे। धणकां पहुंचने से पहले ही रास्ते में 13-14 लोगों की एक भीड़ ने तेज़दार हथियारों से उनको बेरहमी से क़त्ल कर दिया। पहले काहन सिंह और लहणा सिंह को क़त्ल किया गया। अपने बाप का क़त्ल होते देख बच्ची डर से चीखने लगी, तो गुण्डों ने पहले उसके पेट में बरछी मारी और फिर एक छुरी से उसका गला काट दिया।

* 1 जनवरी 1947 को सैंकड़ों हमलावरों ने मोहरी वडभैंन गांव पर दुपहर के वक़्त हमला बोल दिया। हमले के वक़्त मोहरी वडभैंन में लगभग 350 हिंदू और सिख मौजूद थे। जैसे ही गांव पर हमला शुरू हुआ, हिंदू और सिख अपनी हिफ़ाज़त के लिये अपने घरों को छोड़कर गांव के गुरुद्वारे में आ गये। जब रात हुई और अंधेरा गहरा हो गया, तो सर्दी की वजह से हमलावर गुरुद्वारे से दूर होकर बैठ गये। गुरुद्वारे के अंदर घिरे हुए सभी लोगों ने फ़ैसला किया कि अब गांव छोड़कर जाना ही होगा, क्योंकि अब गांव में रहना महफ़ूज़ नहीं है। वो सभी लोग
चुपचाप गुरुद्वारे से बाहर निकले और अपने जलते हुए घरों को बेबसी से देखते हुये गांव से निकलने लगे। रात के अंधेरे में जब कि बहुत सर्दी पड़ रही थी, यह 350 के लगभग हिंदू और सिक्खों का काफ़िला चुपचाप, बिना आवाज़ किए मोहरी वडभैंन से निकला और हवेलियां की तरफ़ बढ़ने लगा।

* मोहरी वडभैंन पर हमले के समय जो लोग फुर्ती से अपने घरों को छोड़कर गुरुद्वारा साहिब में पहुंच गये, वो सभी बच गये। लेकिन ऐसे भी लोग थे, जो अपने घरों से निकल नहीं सके, या, जो अपने घरों से निकले तो सही, लेकिन गुरुद्वारे तक नहीं पहुंच पाये। इनमें से शेर सिंह, मेहताब सिंह, ज्ञान सिंघ, गुलाब सिंह और उनका परिवार मोहरी वडभैंन गांव में ही हमलावरों के हाथों मारे गये।

* उसी दिन, यानी 1 जनवरी 1947 को ही अखरूटा गांव पर भी हमला किया गया। इस गांव में सिखों और हिंदुओं के 80 घर थे। गोकुल सिंह की गोलियां लगने से मौत हो गई। गुलाब सिंह और उनकी बीवी, रंगील सिंह की बेटी, एक और औरत श्रीमती लीलावंती समेत कुल 6 हिन्दू और सिख अखरूटा गांव पर हुये हमले में मारे गये। एक 9-10 साल की बच्ची को गुण्डे उठा कर ले गये।

* गांवों में हिन्दुओं और सिखों पर हमलों की ख़बरें सुनकर हमारे गांव मुहाड़ी के सभी हिन्दु और सिख आपस में सलाह करने लगे। सभी ने मिलकर फ़ैसला किया कि गांव को छोड़ देना ही सही है। हमारे गांव के सभी हिन्दू और सिख पहली और दूसरी जनवरी के बीच की रात को चुपचाप अपने घरों से निकले और मुहाड़ी को अलविदा कह दी।

* धणकां-कड़छाँ के हिन्दू और सिख भी पहली और दूसरी जनवरी के बीच की रात को अपने गांव को छोड़ कर हवेलियाँ की तरफ़ चल दिये। जब धणकां गांव पर हमला हुआ, तो उस वक़्त काला सिंघ और रवेल सिंघ उस गांव में थे। इनके पास एक राइफल और एक पिस्टल थी। कुछ घण्टों तक दोनों तरफ से फायरिंग होती रही। आख़िर काला सिंह गोलियां लगने से शहीद हो गये। रवेल सिंह किसी तरह से धणकां से निकलकर हमारे गांव मुहाड़ी में पहुंच गये। जब हमारे गांव मुहाड़ी पर हमला हुआ, उस वक़्त वहां सिर्फ़ एक ही सिख रवेल सिंह मौजूद थे, जो के घर के अंदर बंद हुए बैठे थे। हमलावरों ने जब यह जाना कि इस घर के अंदर एक सिख बंद है, तो उन्होंने घर को आग लगा दी। हमारे मुहाड़ी में उसी घर के अंदर रवेल सिंह जिंदा ही जला दिये गये।

* 1 जनवरी को ही जाबा गांव पर हमला किया गया। गांव में हिंदू और सिख परिवारों में उस वक्त ज़्यादातर बूढ़े मर्द औरतें और बच्चे थे। हिंदुओं सिखों के बुजुर्गों ने देखा कि अब संभलने का वक्त नहीं था। उन्होंने अपने घरों को खुला ही छोड़ कर औरतों और बच्चों समेत गांव के पास ही एक पहाड़ी चोटी पर जाकर मोर्चा संभाल लिया। जब गांव पर हमला हुआ, तो खुले पड़े घरों को हमलावरों ने लूट लिया। हिंदू और सिख परिवार रात होने तक उसी पहाड़ी चोटी पर टिके रहे। जब रात हुई, तो वह वहां से निकले और चलते चलते पीपला गांव में पहुंच गये। पीपला गांव में कई सिख परिवार रहते थे। अब पीपला गांव के सिख परिवार और जाबा से आए हिंदू और सिख परिवार इकट्ठे होकर रात के अंधेरे में ही हवेलियां की तरफ़ चल पड़े।

भाग दूसरा – ज़िला हज़ारा में हिन्दुओं-सिखों का क़त्ल-ए-आम । पाकिस्तान की स्थापना ।

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इस विडियो के ख़ास नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस की मिनिस्ट्री डॉक्टर ख़ान साहब की रहनुमाई में थी। डॉक्टर ख़ान साहिब सरहदी गान्धी ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान साहिब के भाई थे। ये काँग्रेस में थे। ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार खान साहिब हमेशा ही हिन्दू-मुस्लिम unity के हक़ में रहे थे। एक लाख से भी ज़्यादा मुसलमान, ख़ास तौर पर पश्तून, ख़ान साहिब की खुदाई ख़िदमतगार मूवमेंट के मेम्बर थे। ब्रिटिश हुकूमत के ज़ुल्मों का सामना खुदाई खिदमतगारों ने पूरी शान्ति से किया था। ख़ान साहिब पाकिस्तान की मांग के सख़्त खिलाफ थे। वो नहीं चाहते थे कि यूनाइटेड इण्डिया का बटवारा करके पाकिस्तान बने। इससे भी हिन्दुओं और सिखों को यह यकीन था कि पाकिस्तान नहीं बनेगा। कम-अज़-कम उनकी जान-ओ-माल को कोई ख़तरा नहीं, ऐसा हज़ारा के हिन्दुओं और सिखों को लगता था।

* जिला हजारा के ऐसे कई पहाड़ी गांव थे, जो ऐबटाबाद, हरीपुर, या मानसेहरा से काफी दूर थे और वहां पर एक-एक, दो-दो, या ऐसे ही बहुत कम परिवार हिन्दुओं और सिखों के रहते थे। जाहिर था कि दूर-दराज के ऐसे गावों और बस्तियों में रह रहे हिन्दु और सिक्खों को बहुत बड़ा खतरा था। यह फैसला हुआ कि उनको वहां उनके गाँवों से निकालकर एबटाबाद ले आया जाए।

* ऐसे ही जब 12 दिसंबर 1946 को जबोड़ी-डाडर के कुछ हिन्दू और सिख परिवारों के लोगों को लारी के ज़रिये, बस के ज़रिये उनके गांव से निकालकर ऐबटाबाद की तरफ ले जाया जा रहा था, तो सुनकियारी से लगभग 5 मील की दूरी पर नदी के पुल पर बस को रोककर हिन्दुओं और सिखों को तेज़धार हथियारों से मारना शुरू कर दिया। उनका सारा माल असबाब लूट लिया गया। कुल 16 हिन्दु और सिख मर्द, औरतें और बच्चे बेरहमी से क़त्ल कर दिए गए और बाकी बहुत बुरी तरह से ज़ख्मी हुए।

* 19 दिसंबर 1946 को ढूढ़ियाल और जलो गाँवों पर जबरदस्त हमला किया गया। दोनों गाँवों में हिन्दु और सिख दुकानदारों को मार दिया गया। गांव के और हिन्दु और सिखों पर भी हमला किया गया। घरों को जला दिया गया और कई हिन्दु और सिख औरतों से जबरदस्ती की गई।

* मानसेरा तहसील के गांवों में हिन्दुओं और सिखों के क़त्ल के बाद ऐबटाबाद और आस-पास के गाँवों के हिन्दुओं और सिखों का एक डेपुटेशन डिप्टी कमिश्नर और SP को मिला और अपनी जान और माल की हिफाज़त की गारंटी मांगी और अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती, तो वह हिन्दुओं और सिखों को अपनी हिफाजत खुद करने के लिए सरकारी हथियार दे।

* हवेलियां कसबे में मुस्लिम लीग और मुस्लिम लीग की नेशनल गार्ड वालों ने एक बहुत बड़ा जुलूस निकाला। यह जुलूस रेलवे स्टेशन पर पहुंच कर एक बहुत बड़े जलसे के रूप में बदल गया। इस जलसे को मुखातिब करते हुए लीग के कई लोकल रहनुमाओं, मज़हबी जनूनी जागीरदारों, और कट्टरपंथियों ने सूबे की डॉक्टर ख़ान साहिब की मिनिस्टरी की निंदा की। जो रहम दिल लोकल मुसलमान हिन्दुओं और सिखों की मदद कर रहे थे, जलसे में उनकी भी निन्दा की गई और उनके लिए बहुत भद्दे अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल किया। पंजाब में सिक्खों के हाथों मुसलमानों के मारे जाने की झूठी बातें लोगों को सुना सुना कर भड़काया गया, हालांकि दिसंबर 1946 और जनवरी 1947 में पंजाब में मुसलमानों पर हमले नहीं हुए थे। लोगों को भड़काया गया कि पंजाब से सिख आ रहे हैं और सरहदी सूबे पर हमला करेंगे और यहां के मुसलमानों को मारेंगे।

* इस तरह यह हवेलियाँ, झंगडा, राजोइया, गौड़ा, फुलगरां, दमदौड, बांडा, पीरकोट, पिपल, मुजाब, जाबा, मोहाड़ी, धणक-कड़छ, नारा, सतोड़ा, औगल, घगडोतर, मोहरी वडभैंन, दवाल, अखरूटा, नगरी मकोल, भजूर, लोरा, कुटल, घड़ागा, बजाड़ियां जैसे गांवों और मलाछ के इलाके में 7-8 बिखरी हुई बस्तियों में रहने वाले हिन्दुओं और सिखों पर ख़ूनी हमलों की शुरुआत थी। इन गावों में मोहाड़ी हमारा गाँव था।

ज़िला हज़ारा में हिन्दुओं-सिखों का क़त्ल-ए-आम (भाग पहला) । पाकिस्तान की स्थापना ।

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इस विडियो के मुख्य नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* “ख़ून से लेंगे पाकिस्तान।” पाकिस्तान मूवमेंट के दौरान आल इण्डिया मुस्लिम लीग और मुस्लिम लीग नेशनल गार्डस का यह नारा एक ख़ास सन्देश देता था। पश्चमी पंजाब, सिन्ध, और नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविन्स के हिन्दू और सिख इस नारे की गम्भीरता को अपना बहुत बड़ा जान-ओ-माल का नुक़्सान करा कर ही समझ पाये थे।

* ज़िला हज़ारा के एक-दो नहीं, बहुत सारे गांवों पर हमले हुये और सिखों और हिन्दुओं को क़त्ल किया गया। इन सब के बारे में जो मुझे पता है, वो मुझे बताना चाहिये। और, मैं वो सब बताऊंगा। आगे की कुछ वीडिओज़ में मैं हिन्दुओं और सिखों पर हुये ज़ुल्मों के बारे में ही बताऊंगा। मुझे अपनी इन वीडिओज़ के हज़ारों views नहीं चाहिये। कोई एक भी इन्सान मेरी इन वीडिओज़ को ध्यान से सुनकर हमारे हिन्दुओं और सिखों के बुज़ुर्गों के उजड़ने के दर्द को समझ ले, तो मेरा ये वीडियोज़ बनाने का मक़सद पूरा हो जायेगा।

* हज़ारा के हज़ारों हिन्दू और सिख बहुत मुश्किल से वहां से निकल कर इण्डिया पहुँचे थे। वहां से निकलने की कोशिश करते हुये सैंकड़ों हिन्दू और सिख बेरहमी से क़त्ल कर दिये गये थे। कितनों को ज़िन्दा ही जला दिया गया था। कितनी ही सिख और हिन्दू लड़कियों को, औरतों को ज़बरदस्ती का शिकार बनाया गया। उनको बेइज़्ज़त किया गया। उनको अग़वा कर लिया गया। 8-8 साल की, 9-9 साल की मासूम बच्चियों तक को बख्शा नहीं गया। कितने ही घरों को लूट लिया गया। कितने ही घरों को जला दिया गया। मंदिरों और गुरद्वारों को भी आग लगा दी गयी।

पाकिस्तान से लौटने वाले लोग । पाकिस्तान की स्थापना ।

پاکستان سے لوٹنے والے لوگ
قیام پاکستان
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पाकिस्तान की मांग के विरोधी मुसलमान । पाकिस्तान की स्थापना (Hindi/Urdu)

#पाकिस्तान_की_स्थापना । #यूनियनिस्ट_पार्टी । #मजलिस_ए_अहरार_ए_इस्लाम । #मौलाना_अबुल_कलाम_आज़ाद । #डॉ_सैफुद्दीन_किचलु । #डॉ_मग़फ़ूर_अहमद_अजाज़ी । #आल_इण्डिया_जमहूर_मुस्लिम_लीग । #ख़ान_अब्दुल_गफ़्फ़ार_ख़ान । #ख़ुदाई_ख़िदमतगार ।

इस विडियो के मुख्य नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* मार्च, 1940 में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने अपने लाहौर सेशन में अलग मुस्लिम मुल्क की मांग रखी थी, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि यूनाइटेड इंडिया के सब मुसलमान ही इंडिया से अलग एक मुस्लिम मुल्क बनाने के हक में थे, या मुसलमानों की सभी जमातें ही इंडिया से अलग एक मुस्लिम मुल्क बनाने के हक में थीं।

* मैं पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी की बात इससे पहले की एक वीडियो में कर चुका हूं। यूनियनिस्ट पार्टी में हिन्दू और सिख भी थे, लेकिन इसमें मैजोरिटी मुसलमानों की ही थी। 1937 से पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी की ही मिनिस्ट्री थी। 1937 से 1942 तक सर सिकन्दर हयात खान पंजाब के चीफ मिनिस्टर रहे। उनकी मौत के बाद 1942 में सर ख़िज़्र हयात टिवाणा चीफ मिनिस्टर बने। मार्च 1947 तक वो ही चीफ मिनिस्टर रहे। यूनियनिस्ट मिनिस्ट्री ऑफिशियली पाकिस्तान स्कीम की हिमायत नहीं करती थी।

* मजलिस-ए-अहरार-ए-इस्लाम पार्टी की बुनियाद 29 दिसम्बर 1929 को रखी गई थी। इस पार्टी का base पंजाब में था। नार्थ वेस्ट frontier प्रोविन्स में भी इसका कुछ असर था। मौलाना हबीब उर रहमान लुधियानवी, चौधरी अफ़ज़ल हक़, और सईद अताउल्लाह शाह बुखारी इस पार्टी के रहनुमाओं में थे। इंडिया की आज़ादी और अलग-अलग फ़िरक़ों में अच्छे ताल्लुक़ात कायम करना इस का मक़सद था। मुस्लिम लीग वाले मुहम्मद अली जिन्नाह को क़ायद ए आज़म कहते थे, लेकिन अहरार वाले उन्हें काफ़िर ए आज़म कहते थे। यूनाइटेड इण्डिया की पार्टीशन का मजलिस-ए-अहरार-ए-इस्लाम ने विरोध किया था। इण्डिया में 1947 में बाद यह पार्टी Majlis-E-Ahrar Islam Hind, मजलिस ए अहरार इस्लाम हिन्द के नाम से लुधियाना में centered हो के चलती रही, हालांकि इण्डियन पंजाब से ज़्यादातर मुस्लिम आबादी पाकिस्तान चले जाने की वजह से अहरार का असर बिल्कुल कम हो गया।

* पाकिस्तान की मांग और two nation theory का ज़ोरदार विरोध करने वाले मुसलमानों में एक बड़ा नाम मौलाना अबुल कलाम आज़ाद साहिब का है। उर्दू, अरबी, और फ़ारसी के आलिम, इस्लामिक स्कॉलर, मौलाना सईद अबुल कलाम महियुद्दीन अहमद आज़ाद की पैदाइश इस्लाम के सबसे मुक़द्दस शहर मक्का में हुई । कहा जाता है कि उनके खानदान का सीधा ताल्लुक़ इमाम हुसैन साहिब से था। मौलाना साहिब 1940 से 1945 तक कांग्रेस के प्रेजिडेंट रहे। भारत के आज़ाद होने के बाद मौलाना साहिब भारत के पहले एजुकेशन मिनिस्टर बने। 11 नवम्बर को उनके जन्मदिन को भारत में नेशनल एजुकेशन डे के तौर पर मनाया जाता है। उनकी मौत के कई साल बाद 1992 में भारत सरकार ने उनको भारत रत्न दिया।

* पाकिस्तान की मांग का ज़ोरदार विरोध करने वाले मुसलमान रहनुमाओं में एक और बड़ा नाम पंजाब के डॉ सैफ़ुद्दीन किचलू साहिब का है। इण्डियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हो कर वो हमेशा हिन्दू-मुस्लिम यूनिटी के लिये कोशिशें करते रहे। ब्रिटिश हुकूमत ने उनको कई बार ग्रिफ्तार किया और वो कुल मिलाकर कोई 14 साल जेल में रहे। आल इण्डिया मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग की उन्होंने ज़बरदस्त मुख़ालफ़त की। 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद उनका घर दंगाबाज़ों ने जला दिया, जिसके बाद वो दिल्ली चले गये। उनकी मौत 1963 में हुई।

* डॉ मग़फ़ूर अहमद अजाज़ी आल इण्डिया मुस्लिम लीग में थे। जब आल इण्डिया मुस्लिम लीग ने 1940 मे लाहौर में अलग मुस्लिम देश बनाने का मता / क़रारदाद पास किया, तो वो इसके खिलाफ़ थे। इसलिये उन्होने ने उसी साल आल इण्डिया जमहूर मुस्लिम लीग के नाम से एक अलग सियासी जमात खड़ी कर ली। आल इण्डिया जमहूर मुस्लिम लीग का पहला सेशन बिहार के मुजफ्फरपुर में हुआ, जिसमे डॉ मग़फ़ूर अहमद अजाज़ी को जनरल सेकरेटरी चुना गया। आल इण्डिया जमहूर मुस्लिम लीग का एक बड़ा हिस्सा डॉ मग़फ़ूर अहमद अजाज़ी की रहनुमाई में इंडियन नेशनल काँग्रेस में शामिल हो गया।

* पाकिस्तान की मांग का विरोध करने वाले मुस्लिम रहनुमाओं में सबसे बड़ा नाम सरहदी गाँधी भारत रत्न ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान साहिब का है। सूबा सरहद के ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान साहिब इंडियन नेशनल काँग्रेस के एक बड़े रहनुमा थे, जिन्होने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ जद्दोजहद में हिस्सा लिया। खान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान साहिब को अहिंसा या non-violence की उनकी policies के लिए सरहद्दी गाँधी भी कहा जाता था, क्यूंकि उन्होने सूबा सरहद में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ non-violent मूवमेंट चलाई थी। प्यार से लोग उन्हें बादशाह ख़ान या बाचा ख़ान भी कहते थे। ख़ान साहिब ने 1929 में खुदाई ख़िदमतगार मूवमेंट शुरू की। खुदाई ख़िदमतगार मूवमेंट में एक लाख से ज़्यादा मुसलमान मेम्बर थे। अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान साहिब ने आल इण्डिया मुस्लिम लीग की इण्डिया की पारटिशन करने की मांग की सख़्त मुखालफत की। जब इंडियन नेशनल काँग्रेस ने खुदाई ख़िदमतगार की सलाह के बिना ही पारटिशन प्लान पर अपनी सहमति जताई, तो ख़ान साहिब ने काँग्रेस के रहनुमाओं से कहा था, “आप ने हमें भेड़ियों के आगे फेंक दिया है।”

* इंडियन नेशनल कॉंग्रेस के 100 साल पूरे होने पर 1985 में ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान साहिब भारत आए और इंडियन नेशनल काँग्रेस की celebrations में शामिल हुये। 1987 में वो फिर भारत आये, जब भारत सरकार ने उनको भारत सरकार का सबसे बड़ा civilian award भारत रत्न दिया।

* 20 जनवरी, 1988 को ख़ान साहिब की मौत पेशावर में हुई। उनकी मौत के कुछ घण्टों के अन्दर ही भारत के उस वक़्त के प्राइम मिनिस्टर राजीव गान्धी अपने कुछ मिनिस्टर्स के साथ पेशावर पहुँचे और सभी भारतीयों की तरफ़ से ख़ान साहिब को श्रद्धांजलि दी। भारत सरकार ने ख़ान साहिब की मौत पर पाँच दिन के सोग का ऐलान किया था।

पंजाब में पाकिस्तान मूवमेंट । पाकिस्तान की स्थापना । (Hindi/Urdu)

#पाकिस्तान_की_स्थापना । #हिन्दू_मुसलमान_सिख ।

इस विडियो के मुख्य नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* 1937 में हुये लेजिस्लेटिव assemblies के इलेक्शन्स में इण्डियन नेशनल कांग्रेस ने अलग-अलग प्रोविंसेज़ में 1585 में से 707 सीटें हासिल कीं। आल इण्डिया मुस्लिम लीग को सिर्फ़ 106 सीटें मिलीं।

* कांग्रेस 8 प्रोविंसेज़ में कामयाब रही। बंगाल, पंजाब, और सिन्ध ही ऐसे तीन सूबे थे, जहां कांग्रेस को अपनी मिनिस्ट्री बनाने में कामयाबी नहीं मिली थी। लेकिन, मुस्लिम लीग तो किसी भी प्रोविन्स में अपनी मिनिस्ट्री बनाने में नाकामयाब रही थी।

* 1937 में मुस्लिम लीग की टिकट पर जीतने वाले मुसलमानों से ज़्यादा तादाद उन मुसलमानों की थी, जो दूसरी पार्टीज़ की टिकट पर जीते या जो इंडिपेंडेंट canditates के तौर पर जीते थे।

* नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविन्स में इण्डियन नेशनल कांग्रेस ने 50 में से 19 सीटें जीतीं थी। नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविन्स की लेजिस्लेटिव असेम्बली में मुस्लिम लीग का कोई मेम्बर नहीं थी। वहां कांग्रेस ने ही अपनी मिनिस्ट्री बनाई।

* सिन्ध में 72 फ़ीसद आबादी मुसलमानों की थी। सिन्ध की 60 सीटों में से मुस्लिम लीग एक भी सीट नहीं जीत पाई। सिन्ध यूनाइटेड पार्टी को 22 और कांग्रेस को 8 सीटें मिलीं।

* यूनियनिस्ट पार्टी के सर सिकन्दर हयात खान 1937 से 1942 तक संयुक्त पंजाब के चीफ़ मिनिस्टर रहे।

* कांग्रेस ने पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी की मिनिस्ट्री की सख़्त मुख़ालफ़त करनी शुरू की। अपने भाषणों में पण्डित नेहरू अक्सर सर सिकन्दर हयात खान को ब्रिटिश हुकूमत का दरबारी कहते। मुहम्मद अली जिन्नाह और आल इण्डिया मुस्लिम लीग की रहनुमाई पर भी वो सवाल खड़े करते रहते।

* नेहरु के इस तरह सिकन्दर हयात खान और जिन्नाह के ख़िलाफ़ बोलते रहने से सिकन्दर हयात खान और जिन्नाह ने एक-दूसरे के क़रीब आने का फ़ैसला किया, ताकि नेहरू की चालों का मुक़ाबला किया जा सके। इसका नतीजा था कि मुस्लिम लीग के 1937 में हुये लखनऊ सैशन में सिकन्दर-जिन्नाह पैक्ट हुआ। फिर पंजाब का सियासी सीन बदलना शुरू हुआ।

* बाद में, पंजाब की मुस्लिम लीग ने महसूस किया कि सिकन्दर हयात खान मुस्लिम लीग की पंजाब में तरक़्क़ी को रोक रहे हैं। उन्होंने इसके ख़िलाफ़ जिन्नाह के पास शिकायत की। जिन्नाह बहुत दूर-अंदेश थे। उन्होंने सिकन्दर हयात खान के लिये मुश्किलें खड़ी करने की पण्डित नेहरू की ग़लती नहीं दुहराई। उन्होंने धीरज से काम लिया और मुस्लिम लीग के लोगों से कहा कि सिकन्दर हयात के साथ co-operation ही करते रहो। सिकन्दर हयात खान पंजाब में बहुत पॉपुलर थे। पण्डित नेहरू उनकी पॉपुलैरिटी को कम करके उनकी सरकार गिराना चाहते थे और जिन्नाह सिकन्दर की पॉपुलरटी को बचाये रखते हुये उससे मुस्लिम लीग के लिये फ़ायदा लेना चाहते थे।

* 1942 को गांधी जी ने Quit India Movement, भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू कर दिया। ब्रिटिश हुकूमत ने गांधीजी समेत कांग्रेस के लगभग सभी बड़े leaders को क़ैद कर लिया। ये सभी 1944 तक जेलों में ही बन्द रहे। जिन्नाह और मुस्लिम लीग के लिये मैदान ख़ाली था। अपना base बढ़ाने के लिये उनके पास यह बहुत बड़ा मौक़ा था। और, उन्होंने यह मौक़ा नहीं गवाया। बस फिर देखते ही देखते पाकिस्तान मूवमेंट ने ज़ोर पकड़ने लगी।

* सिकन्दर हयात खान की मौत के बाद 1942 में सर ख़िज़्र हयात टिवाणा पंजाब के चीफ मिनिस्टर बने। अब तक पंजाब असेम्बली के कई मुसलमान मेम्बरज़ मुस्लिम लीग के साथ हो चुके थे। मुस्लिम लीग ने टिवाणा पर दबाव बनाये रखा।

* यूनियनिस्ट पार्टी ऑफिशियली पाकिस्तान की मांग के ख़िलाफ़ थी। असेम्बली के सिख और हिन्दू यूनियनिस्ट मेम्बरज़ पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खुल कर बोल रहे थे। ऐसे में मुस्लिम लीग चाहती थी कि पंजाब सरकार ऑफिशियली पाकिस्तान की स्थापना की हिमायत करे। टिवाणा ने ऐसा नहीँ किया, तो जिन्नाह ने यूनियनिस्ट मुस्लिम लीडरान को ग़द्दार कहना शुरू कर दिया। इससे यूनियनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग के सम्बन्ध बिगड़ गये।

* 1944 में सी राजगोपालाचार्य के फ़ॉर्मूले पर गांधी जी ने जिन्नाह से बॉम्बे में बातचीत शुरू कर दी। राजगोपालाचार्य का फ़ॉर्मूला बुनियादी तौर पर पाकिस्तान बनाये जाने की मांग को क़बूल करता था, लेकिन इसमें इस मुद्दे पर राय शुमारी कराये जाने की बात थी। रायशुमारी जिन्नाह को मन्ज़ूर नहीं थी, और इसी वजह से गांधी-जिन्नाह बातचीत ख़त्म हो गयी।

* पाकिस्तान बनने से सबसे ज़्यादा मुश्किलें सिखों को ही आनी थीं, क्योंकि उनकी आबादी का एक हिस्सा उस इलाके में रहता था, जहां पाकिस्तान बनने वाला था। सिखों के कितने ही इतिहासिक पवित्र गुरुद्वारे भी वहां थे। राजगोपालाचार्य फ़ॉर्मूले को एक्सेप्ट करके गांधी जी के जिन्नाह से बातचीत करने को अकाली दल के रहनुमा मास्टर तारा सिंघ ने कांग्रेस द्वारा सिखों से धोखा क़रार दिया।

* कोई कितनी भी सफाई देता फिरे, लेकिन 1944 में गांधी जी और जिन्नाह साहिब की मीटिंग के बाद यह साफ़ हो चुका था कि कांग्रेस पार्टी भी अब अलग पाकिस्तान की मांग के हक़ में थी।

* 1946 में हुये इलेक्शन्स में अलग-अलग सूबों में इण्डियन नेशनल कांग्रेस ने 1585 सीटों में से कुल 923 सीटें जीतीं। आल इण्डिया मुस्लिम लीग को 425 सीटें मिलीं, जबकि 1937 में उसे 106 सीटें ही मिलीं थीं। 9 साल में मुस्लिम लीग ने ऐसी सियासत खेली कि उसकी सीटों की गिनती चार गुना बढ़ गयी।

* सिन्ध में मुस्लिम लीग ने 27 सीटें हासिल कीं और 4 इंडिपेंडेंट मुस्लिम मेम्बरज़ की सपोर्ट से अपनी मिनिस्ट्री बनाई।

* 1946 के पंजाब में हुये elections में मुस्लिम लीग ने 75 seats पर जीत हासिल की और पंजाब लेजिस्लेटिव असेम्बली में सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस दूसरे नम्बर पर थी और अकाली दल तीसरे नम्बर पर था। यूनियनिस्ट पार्टी चौथे नम्बर पर रही।

* 1937 में जब यूनियनिस्ट पार्टी पंजाब में मैजोरिटी में थी, तो कांग्रेस यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार को गिराने की कोशिशें करती रही। अब, 1946 में जब यूनियनिस्ट पार्टी चौथे नम्बर पर थी, तो कांग्रेस इनकी सरकार बनाने की कोशिश में जुट गई। उधर मुस्लिम लीग असेम्बली में सबसे बड़ी पार्टी होने की वजह से अपनी मिनिस्ट्री बनाना चाहती थी। ऐसा उसका हक़ भी था।

* 2 अप्रैल, 1946 को जिन्नाह साहिब की एक मीटिंग सिख रहनुमाओं से रखी गई। सिखों की तरफ़ से इस में मास्टर तारा सिंघ, पटियाला के महाराजा याद्विंदर सिंघ, महाराजा याद्विंदर सिंघ के प्रधानमंत्री हरदित्त सिंघ मलिक, और ज्ञानी करतार सिंघ शामिल हुये थे। जिन्नाह साहिब ने सिखों को पाकिस्तान में शामिल होने के लिये राज़ी करने की कोशिश की। लेकिन, यह बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची।

* कांग्रेस, यूनियनिस्ट पार्टी और सिखों के बीच बातचीत होने के बाद ख़िज़्र हयात टिवाणा की रहनुमाई में यूनियनिस्ट पार्टी, कांग्रेस और अकाली दल की मिनिस्ट्री बना दी गयी। इससे पंजाब में मुस्लिम लीग के हिमायती मुसलमानों में ज़बरदस्त ग़ुस्सा फैल गया। मुस्लिम लीग ने पंजाब की मिनिस्ट्री के ख़िलाफ़ मूवमेंट शुरू की। 1946 के आख़िर तक पंजाब में जगह-जगह पर दंगे होने शुरू हो गये। 1947 के शुरू तक हालात बहुत बिगड़ गये। आख़िर 2 मार्च, 1947 को ख़िज़्र हयात टिवाणा ने इस्तीफ़ा दे दिया।

* अगले दिन, 3 मार्च को लाहौर में असेम्बली हाल के बाहर अकाली रहनुमा मास्टर तारा सिंघ ने 400-500 सिखों के साथ हज़ारों पाकिस्तान के हिमायती मुसलमानों के सामने पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाये। उस दिन से लाहौर में मुसलमान दंगाबाज़ों और सिख दंगाबाज़ों के बीच ऐसे ख़ूनी दंगे शुरू हुये, जो पहले कभी नहीं हुये थे। यह दंगे पंजाब के और हिस्सों में भी फैल गये। रुक-रुक कर यह दंगे होते ही रहे। पाकिस्तान बनने तक और फिर उसके कुछ बाद तक दंगे और भयानक होते गये। इण्डिया में और जगहों पर हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो ही रहे थे। पंजाब में भी हिन्दू इन दंगों की गरिफ़्त में आ गये। मरने वालों की तादाद हज़ारों में नहीं, बल्कि लाखों में थी।

* हक़ीक़त यही है कि पंजाब के बिना पाकिस्तान नहीं बन सकता था। 1937 से 1947 तक का दस साल का वक़्त बड़ा ख़ास और नाज़ुक था। इस वक़्त में ही जिन्नाह की सियासत और डिप्लोमेसी की वजह से आल इण्डिया मुस्लिम लीग उस मुक़ाम तक पहुंची, जहां पाकिस्तान के क़याम से, पाकिस्तान की स्थापना से इस subcontinent का नक़्शा ही बदल गया। यह वो दौर था, जिसमें पण्डित नेहरू और गांधी जी ने वो सियासी ग़लतियाँ कीं, जिनके नतीजे में भारत को यूनाइटेड रखना, अखण्ड रखना नामुमकिन हो गया।

फ़िरक़ापरस्ती में इज़ाफ़ा और दंगे – भाग 3/3 । पाकिस्तान की स्थापना (Hindi/Urdu)

#पाकिस्तान_की_स्थापना । #हिन्दू_मुसलमान_सिख । #मुस्लिम_लीग ।

मेहरबानी करके पूरी विडियो देखिये। इस विडियो में मुख्य नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* 1940 तक मुहम्मद अली जिन्नाह यूनाइटेड इण्डिया के मुसलमानों के सबसे बड़े लीडर के तौर पर उभर चुके थे। उन्हें क़ायद-ए-आज़म (great leader) के तौर पर जाना जाता था।

* मार्च 23, 1940 को आल इण्डिया मुस्लिम लीग के लाहौर सैशन में मुस्लिम मेजोरिटी वाला एक अलग देश बनाने का resolution, मता पेश किया गया, जिसे अगले दिन पास कर दिया गया।

* मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान की मांग का हिमायती बन गया। 1946 में इण्डिया की Constituent Assembly के लिये हुये elections में मुसलमानों के लिये reserve 476 सीटों में से आल इण्डिया मुस्लिम लीग ने 425 सीटों पर जीत हासिल की।

* कैबिनेट मिशन के प्लैन पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग की पूरी सहमति नहीं बन सकी। अलग पाकिस्तान बनाने की मांग पर ज़ोर देने के लिये जिन्नाह ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे का ऐलान कर दिया, जिसमें लोगों से अपील की गयी थी कि वो अपने कारोबार एक दिन के लिये बंद रखें।

* कलकत्ता में फ़साद 1945 से ही हो रहे थे। पहले ये फ़साद यूरोपियन लोगों के खिलाफ़ थे। बाद में ये हिन्दू-मुस्लिम फ़साद की शक्ल अख़्तियार कर गये। 46 नवम्बर 1945 में 46 यूरोपियन और ईसाई इन फ़सादों में मारे गये थे। फरवरी 1946 में 35 यूरोपियन और ईसाई फ़सादों का शिकार हुये।

* 16 अगस्त 1946 को डाइरैक्ट एक्शन डे पर कलकत्ता में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बहुत बड़े स्तर पर दंगे हुये। बंगाल प्रोविन्स में मुसलमानों की तादाद हिन्दुओं से ज़्यादा थी, जबकि कलकत्ता शहर में हिन्दुओं की तादाद मुसलमानों से काफ़ी ज़्यादा थी।

* कलकत्ता में मुस्लिम लीग ने दोपहर 2 बजे एक रैली रखी। सुबह ही दुकानों को जबरन बंद कराया जाने लगा। पत्थरबाज़ी और छुरेबाजी की वारदातें होनी शुरू हुई। जब रैली ख़त्म हुई, तो रैली से लौट रहे लोगों ने हिन्दुओं पर हमले करने शुरू कर दिये। इससे शहर के अलग-अलग हिस्सों में दंगे भड़क उठे। अगले दिन 17 अगस्त को ये दंगे और भयंकर रूप ले चुके थे। एक मिल पर हमला कर के वहाँ ठहरे 300 मज़दूरों को मार डाला गया।

* ये भयंकर दंगे एक हफ़्ते तक चले। 4000 से ज़्यादा लोग इस में मारे गये। कई लोगों ने मरने वालों की तादाद 7000 से लेकर 10,000 तक भी बताई है। एक लाख से भी ज़्यादा लोग अपने घर छोड़ कर भाग गये।

* 10 अक्तूबर, 1946 को नोयाखली में दंगे शुरू हुये। यह दंगे असल में दंगे न हो कर हिन्दुओं का क़त्ल-ए-आम था। इस में कितने हिन्दू मारे गये, इस का कोई सही-सही अंदाज़ा लगाना मुमकिन नहीं है। मरने वाले हिन्दुओं की तादाद हज़ारों में थी।

* नोयाखली में हिन्दुओं के क़त्ल-ए-आम के बाद बिहार में मुसलमानों के खिलाफ़ हिंसा होनी शुरू हुई। छपरा, पटना, मुंगेर, और भागलपुर में ख़ास कर के मुसलमानों को निशाना बनाया गया और सैंकड़ों की तादाद में मुसलमान मार डाले गये।

* यूनाइटेड प्रोविंसेस में, गढ़मुक्तेश्वर में लगभग 2000 मुसलमान मार दिये गये।

* 1946 के आख़िर तक दंगे पंजाब और नॉर्थ-वेस्ट फ़्रंटियर प्रोविन्स में भी होने शुरू गये। पाकिस्तान की मांग के नतीजे में सबसे ज़्यादा मारकाट पंजाब में हुई। पश्चिमी पंजाब में मुस्लिम मेजोरिटी थी। वहाँ हिन्दुओं और सिखों का क़त्ल-ए-आम बहुत बड़े पैमाने पर हुआ। पूर्वी पंजाब में मुस्लिम आबादी कम थी। यहाँ मुसलमानों का क़त्ल-ए-आम बहुत बड़े पैमाने पर हुआ।

* वो हिन्दू और सिख, जो अब तक भी पाकिस्तान की मांग के ख़िलाफ़ थे, अब सोचने लगे कि ऐसे ख़ून-ख़राबे से अच्छा है कि अलग पाकिस्तान ही बन जाये।