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गृहस्थ धर्म श्रेष्ठ है

(स्वामी अमृत पाल सिंघ ‘अमृत‘)

सिख परम्परा में भाई साहिब भाई गुरदास जी गुरुमत के महान विद्वान हुये हैं। गुरु साहिबान के प्रति उनकी श्रद्धा अनुकरणीय है। गुरु साहिबान ने भी उनको बहुत सम्मान दिया।

श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के जिस प्रथम स्वरूप को पाँचवे सद्गुरु, श्री गुरु अर्जुन देव जी ने लिखवाया था, उसके लिखारी भाई गुरदास जी ही थे।

आप जी की रचना दो हिस्सों में है। आप जी ने वारें पंजाबी में लिखी हैं, जबकि आपके कबित्त बृज भाषा में हैं।

आपका 376वां कबित्त यह है:-

जैसे सरि सरिता सकल मै समुन्द्र बडो,
मेर मै सुमेर बडो जगतु बखान है।
तरवर बिखै जैसे चन्दन बिरखु बडो,
धातु मै कनक अति उतम कै मान है।
पञ्छीअन मै हन्स, म्रिग राजन मै सारदूल,
रागन मै सिरीरागु, पारस पखान है।
गिआनन मै गिआनु अरु धिआनन मै धिआन गुर,
सकल धरम मै ग्रिहसतु प्रधान है ॥३७६॥

भाई गुरदास जी फ़रमाते हैं कि जैसे सरोवरों और नदियों में समुद्र बड़ा (श्रेष्ठ) है और पर्वतों में सुमेर का जगत व्याख्यान करता है; जैसे वृक्षों में से चन्दन बड़ा है और धातुओं में सोने को उत्तम माना जाता है; पक्षियों में हंस, पशुओं में शेर, रागों में श्रीराग, और पत्थरों में पारस है; (वैसे ही) ज्ञानों में ज्ञान, गुरु द्वारा दिया ज्ञान है, ध्यानों में गुरु का ध्यान है, और धर्मों में गृहस्थ धर्म की प्रधानता है।

गुरमुख जनों की चरणरज,
(स्वामी) अमृत पाल सिंघ ‘अमृत’