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दूसरों की परवाह करना


(स्वामी) अमृत पाल सिंघ ‘अमृत’

जब मैं मिडल स्कूल में पढ़ता था, हमारे प्रिंसिपल बड़े सख़्त अनुशासन वाले थे। जब मैंने पोस्टग्रेजुएशन की, तब वे रिटायरमेंट की उम्र में पहुँच गये। 

जब मैं उनके पास पढ़ता था, तब मुझे उनसे डर लगता था। अब जब कि वे रिटायरमेंट की अवस्था में आ गये, तो मुझे कई बार उनसे लम्बी बातें करने का मौक़ा मिला। मैं कई बार उनके घर चला जाता और उनसे बातें करता रहता। उन्होंने मुझे पंजाब में एक धार्मिक विद्यालय में प्रिंसिपल लगवा दिया। वे मुझे कहते थे, “मैं चाहता हूँ कि तुम्हें धार्मिक क्षेत्र में मान्यता मिले।”

एक दिन वे मुझे कहने लगे कि अब उनको लगता है कि उन्होंने अपनी सारी ज़िन्दगी ऐसे ही बच्चों पर सख़्त अनुशासन रखकर बर्बाद कर दी। बच्चों पर ज़रूरत से ज़्यादा सख़्ती ठीक नहीं है।

आज मुझे अपने उन्हीं प्रिंसिपल साहिब की बातें याद आ रही हैं। 

मुझे भी महसूस होता है कि ख़ुद को नफ़रत से बचाने की अपनी कोशिश में मैं प्रेम बाँटने में कंजूस ही रह गया। मन को शान्त रखने की कोशिश में मेरी लम्बी मौन साधना ने मुझे उन लोगों से भी दूर कर दिया, जिनको उनके परेशानी के क्षणों में मेरी हमदर्दी और गाइडेन्स की ज़रूरत थी। लोगों के दुःखों और परेशानियों को मुझे उनके ही नज़रिए से देखकर उनकी मदद करनी चाहिए, न कि सबकी समस्याओं को अपनी विरक्तता की ऐनक से देखना चाहिए।

मेरे एक प्रियजन की आत्महत्या ने मुझे कुछ हद तक खा लिया था। जब वह बहुत परेशान था, तब वह मुझे बार-बार फ़ोन करता था। मेरी साधना में विघ्न पड़ता था। उसको हौसला देने के लिये मैं मौनव्रत तोड़ देता था। फिर मौनव्रत तोड़ने की खीझ भी उसी पर उतार देता था। 

विरक्तता की मेरी ऐनक से देखने पर उस की समस्या कुछ गम्भीर नहीं थी। बस ‘माया’ थी। दो-तीन श्लोक, थोड़ी-सी फ़िलॉसफ़ी, बस, और मेरे नज़रिए से वह समस्या नदारद। 

पर, उसके नज़रिए से वह जीवन-मृत्यु का प्रश्न था। कितना फ़र्क़ था उसके नज़रिए और मेरे विरक्तता के नज़रिए से! 

जब उसने पहली बार आत्महत्या की कोशिश की, तो उसे हस्पताल में भर्ती किया गया। मैंने उसे ‘माया’ की व्यर्थता पर प्रवचन पिलाया। यह सब ‘माया’ है। जब ‘ज्ञान’ प्रकट होगा, तो ‘माया’ ख़ुद-ब-ख़ुद नष्ट हो जाएगी। यह। वह। फलाना। ढिमका।

अपने-अपने ‘सत्य’ हैं सब के। लोगों के ‘सत्य’ मेरे लिये ‘दृष्टिभ्रम’ (illusion) हैं। मेरा ‘सत्य’ लोगों के लिये ‘साइकोसिस’  (Psychosis) है। आज मेरे लिये जो ‘दृष्टिभ्रम’ या ‘माया’ है, वह कभी मेरे लिये भी ‘सत्य’ था। 

मैं जिसे ‘माया’ कह रहा था, उसके लिये वह ‘सत्य’ था, जिसको नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता था। उसका वह ‘सत्य’ उसके पूरे जीवन पर भारी पड़ रहा था।

उसे मैंने यही कहा था कि सब ठीक हो जाएगा, बस ‘थोड़ा वक़्त’ लगेगा। 

‘थोड़ा वक़्त’ कितना होता है? पता नहीं। ‘थोड़ा वक़्त’ कभी-कभी बहुत ज़्यादा होता है। उस वक़्त में व्यक्ति को कोई हौसला देने वाला चाहिये। बार-बार हौसला देने वाला चाहिये। कोई राह दिखाने वाला चाहिये। बार-बार राह दिखाने वाला चाहिये। विरक्तता की गहन गुफ़ा में बन्द हुये बैठे योगी का मौन वहाँ मददगार नहीं होता। उस मौनी का होना या न होना कोई अर्थ ही नहीं रखता। जब शब्दों की ज़रूरत हो, तब मौन एक अपराध है।

मुझे अपनी एक बात याद आ गई है। मेरे पिता जी की मौत के बाद मैं अकेला हो गया। कुछ लोग मेरी शादी की बात चलाने लगे।

मोहाली के एक गुरुद्वारे में देखने-दिखाने की बात हुई। लड़की वाले लड़की को लेकर वहाँ आये। कुल चार लोग थे वे। एक बिचौला था। और मेरी ओर से मैं था, बिल्कुल अकेला।

जब गुरुद्वारे के अन्दर बैठे, तो उन्होंने लड़की को मेरी बाईं ओर बिठा दिया। मैंने एक बार भी लड़की की ओर नहीं देखा। जैसा कि होता है, उन्होंने मुझसे कई सवाल पूछे। मेरा रोज़गार। मेरी इनकम। मेरा घर। मेरा परिवार। मेरे रिश्तेदार। 

फिर वह मुझे कहने लगे कि आप भी कुछ पूछो लड़की के बारे में। मैंने कहा कि मुझे कुछ नहीं पूछना है।

क्या पूछते हैं लड़की से? यही न, कि कितना पढ़े हैं, खाना बना लेते हैं, ब्लाह ब्लाह ब्लाह। बिचौलिए ने पहले ही बता दिया था कि लड़की ग्रैजुएट है। पिता की मौत हो चुकी है। उसकी माँ है, भाई है, बहन है। शादी की बात चला रहे हैं, तो खाना बनाना तो आता ही होगा। पूछने वाली कोई बात है ही नहीं।

फिर वे कहने लगे कि अकेले में लड़की से बात करनी हो, तो कर लीजिये। मैंने कहा कि मुझे तो कोई ज़रूरत नहीं, अगर आपकी लड़की मुझसे अकेले में बात करना चाहे, तो कर सकती है।

वह लड़की घर से सोचकर भी आई हो कि अकेले में कुछ प्रश्न पूछूँगी, तो मेरी ठण्डी बातें सुनकर उसने मन बना लिया होगा कि इस खड़ूस से शादी नहीं करनी।

शादी तो ज़िन्दगी का प्रश्न है। वहाँ भी मैं कुछ पूछना नहीं चाहता था। क्या लापरवाही थी वह मेरी! कुछ पूछने का, कुछ बात करने का मतलब यह होता है कि मैं तुम्हारी परवाह करता हूँ। बोलने से मेरे परहेज़ ने यह सन्देश दिया कि मैं उस लड़की की परवाह नहीं करता। उसने मुझसे शादी करनी है, तो करे, नहीं तो न करे।

ज़ाहिर है कि मेरा रिश्ता वहाँ नहीं हुआ।

किसी की बात सुनने का मतलब है कि हमें उस की परवाह है। छोटा बच्चा आसमान में से अपने लिये चांद चाहता है। हम जानते हैं कि यह असम्भव है, पर बच्चे के मन को बहलाते हैं, क्योंकि हम उस बच्चे की परवाह करते हैं।

कोई आत्महत्या की कोशिश करके हस्पताल में भर्ती है। उससे बात करने का मतलब यही है कि हम उसकी परवाह करते हैं। यह नहीं कि हम उसे ज्ञान पिलाने बैठ जायें। बस हौसला दें कि ज़िन्दगी यूँ ही गंवा देने के लिये नहीं है। उसे बताएं कि तेरे मर जाने से हमें कितना दर्द होगा। हमें दर्द होगा, क्योंकि हम तेरी परवाह करते हैं। यही सार है एक दुःखी व्यक्ति से बात करने का कि हम उसे जताएं कि कोई है, जो उसकी परवाह करता है। 

परवाह जताई जाती है बोलकर। मौन रहकर नहीं। मैंने अभी लिखा है कि जब शब्दों की ज़रूरत हो, तब मौन एक अपराध है।

जब उसने दूसरी बार आत्महत्या की कोशिश की, तो वह उस में सफल रहा; और मैं असफल हुआ। मेरी तरह वह घर में अकेला ही रहता था। कुछ दिन उसकी लाश ऐसे ही घर में पड़ी रही और बदबू फैलने लगी। फिर पुलिस ने दरवाज़ा तोड़कर लाश बाहर निकाली। 

दृष्टा-भाव। माया। मौन। निवृत्ति। मोक्ष। ये मेरे प्रिय शब्द हैं। प्रियतर शब्द हैं। प्रियतम शब्द हैं। इन शब्दों के फ़िलॉसफ़ी में गहरे अर्थ हैं। पर, दुःखी व्यक्ति के लिये ये सब बे-मायनी हैं। 

जब अर्थपूर्ण शब्दों की ज़रूरत हो, जो बता सकें कि हाँ, हम तुम्हारी परवाह करते हैं, तब फ़िलॉसफ़ी से ‘थोड़े वक़्त’ के लिये छुट्टी ले लेनी चाहिए। 

‘थोड़ा वक़्त’ कितना होता है? पता नहीं।

(स्वामी) अमृत पाल सिंघ ‘अमृत’

मित्र राष्ट्रों के हिन्दू-सिख समाज की मदद भी करे भारत सरकार












(अमृत पाल सिंघ ‘अमृत’)

मित्रतापूर्ण सम्बन्धों को बढ़ावा देने के लिये हमारी केन्द्रीय सरकार ने साल 2014 से लेकर जनवरी, 2018 के बीच अफ़ग़ानिस्तान को 2,088 करोड़ रुपये और श्रीलंका को 1,025 करोड़ रुपये दिये हैं।

मित्र राष्ट्रों की मदद करना बहुत अच्छी बात है। सरकार के इस क़दम की मैं प्रशंसा करता हूँ।

भारत एक बहुत बड़ा देश है, जो आर्थिक तौर पर बहुत तेज़ी से उभर कर विश्व के सामने आया है। हम दुनिया की पांच बड़ी सेनाओं में से एक हैं। हम सबसे ज़्यादा आबादी वाले मुल्क़ों में से एक हैं। हम विविध संस्कृतियों और भाषाओं वाला देश हैं।

जब भी विश्व में कहीं भी हिन्दू, जैन, सिख सम्प्रदायों की बात होती है, तो भारत का भी ज़िक्र आ जाता है। यह स्वाभाविक है। ऐसा इसलिये है, क्योंकि हमारा यह देश हिन्दू, जैन, सिख सम्प्रदायों की मातृभूमि (homeland) है। हमारे संविधान के सेक्युलर होने के बावजूद हमारे भारत की यह विश्व भर में एक विशेष पहचान है। यह एक तथ्य है। कोई इस तथ्य को नापसन्द तो कर सकता है, लेकिन झुठला नहीं सकता।

हिन्दू, जैन, सिख सम्प्रदायों की मातृभूमि (homeland) होने की वजह से भारत की इन सम्प्रदायों के उन लोगों के प्रति एक विशेष ज़िम्मेदारी भी बनती है, जो कहीं विदेश में अपने सम्प्रदाय की वजह से ज़ुल्म का शिकार बनते हैं। उनको ज़ुल्मों से बचाने के लिये असरदार क़दम उठाना भारत सरकार की नैतिक ज़िम्मेदारी है।

अफ़ग़ानिस्तान में लम्बे समय से चल रहे गृहयुद्ध की वजह से वहाँ के हिन्दू-सिख समाज को बहुत ज़ुल्मों का शिकार होना पड़ा है। हज़ारों अफ़ग़ान हिन्दू-सिख परिवार अफ़ग़ानिस्तान में अपने घरों को छोड़कर विदेशों में जाने के लिये मजबूर हो गये हैं। जैसा कि स्वाभाविक ही है, बहुत सारे अफ़ग़ान हिन्दू-सिख परिवार भारत में भी आये हैं। इनमें बहुत ऐसे हैं, जिनको अभी तक भारतीय नागरिकता नहीं मिल सकी है।

जो बहुत थोड़े-से हिन्दू-सिख अभी भी अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे हैं, उनकी हालत बहुत बुरी है।

ख़ानाजंगी का सामना कर रहे अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिये भारत समेत कई देशों ने बहुत बड़ी आर्थिक मदद दी है। यह एक अच्छी बात है। लेकिन इसका एक पक्ष यह भी है कि अफ़ग़ान लोगों की मदद के लिये दिये जा रहे इस धन का कोई विशेष प्रयोग अफ़ग़ान हिन्दुओं, सिखों पर नहीं किया जा रहा, जबकि यह सबसे छोटा अफ़ग़ान अल्पसंख्यक समुदाय ही सबसे ज़्यादा नफ़रत का शिकार बना है।

हम अमेरिका जैसे मुल्क़ों से तो यह उम्मीद नहीं कर सकते कि अफ़ग़ानिस्तान को आर्थिक मदद देते वक़्त वे अफ़ग़ान हिन्दू-सिख समाज का विशेष तौर पर ध्यान रखें, लेकिन भारत सरकार से तो हमें यह उम्मीद रखनी चाहिये कि अफ़ग़ान हिन्दू-सिख समाज का विशेष तौर पर ध्यान रखा जाये।

भारत सरकार जब अफ़ग़ानिस्तान सरकार को किसी भी प्रकार की मदद दे, तो उसके साथ यह शर्त भी हो कि अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे हिन्दुओं-सिखों की सुरक्षा हो। अफ़ग़ानिस्तान सरकार को आर्थिक मदद देते वक़्त उस धन का एक निश्चित हिस्सा अफ़ग़ान हिन्दू-सिख समाज की भलाई पर भी ख़र्च हो। अफ़ग़ानिस्तान सरकार को दी जा रही आर्थिक मदद का एक हिस्सा ज़रूरी तौर पर उन अफ़ग़ान हिन्दुओं-सिखों पर भी ख़र्च हो, जो भारत में रह रहे हैं।

साल 2014 से अब तक जो तक़रीबन 2,088 करोड़ रुपये अफ़ग़ानिस्तान को दिये गये हैं, अगर उसका बीस प्रतिशत भी अफ़ग़ान हिन्दुओं-सिखों पर ख़र्च किया जाता, तो उनकी बड़ी समस्याओं का समाधान किया जा सकता था।

भारत सरकार ने श्रीलंका सरकार को भी 2014 से अब तक 1,025 करोड़ रुपये दिये हैं। अफ़ग़ानिस्तान की तरह श्रीलंका से भी हिन्दू शरणार्थी भारत आये हैं। जो मेरा सुझाव अफ़ग़ानिस्तान के लिये है, वही सुझाव श्रीलंका के लिये भी है। श्रीलंका को दी जाने वाली आर्थिक मदद का एक निश्चित हिस्सा श्रीलंकाई हिन्दुओं पर ख़र्च होना चाहिये। श्रीलंका को दी जाने वाली आर्थिक मदद का एक निश्चित हिस्सा भारत में रह रहे श्रीलंका के हिन्दू शरणार्थियों पर भी ख़र्च होना चाहिए।

म्यांमार से निकाले गये रोहिंग्या लोगों का हमें भी वैसा ही दुःख है, जैसा पश्चिमी देशों की सरकारों को है। लेकिन हमें अफ़ग़ानिस्तान और श्रीलंका से निकाले गये हिन्दुओं का भी दुःख है। पश्चिमी देशों की सरकारों ने तो अरबों डॉलर अफ़ग़ानिस्तान पर ख़र्च करते वक़्त अफ़ग़ान हिन्दुओं, सिखों के बारे में कभी सोचा भी नहीं।

आख़िर ऐसा कब तक चलता रहेगा कि जिन देशों से हिन्दू सिखों को निकलना पड़ रहा है, भारत सरकार अपने करदाताओं की मेहनत की कमाई उन देशों को देती जाये, बिना वहाँ के हिन्दू-सिख समाज की मदद किये?












‘तहरीक-ए- लब्बैक या रसूल अल्लाह’ का धरना












‘तहरीक-ए- लब्बैक या रसूल अल्लाह’ का धरना

(अमृत पाल सिंघ ‘अमृत’)

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कट्टरपंथी मज़हबी जमात ‘तहरीक-ए- लब्बैक या रसूल अल्लाह’ के प्रमुख ख़ादिम हुसैन रिज़वी की रहनुमाई में पिछले तीन हफ़्तों से चल रहा धरना क़ानून मन्त्री ज़ाहिद हामिद के इस्तीफ़े के बाद आज ख़त्म कर दिया गया है।

इलेक्शन एक्ट में उम्मीदवार की तरफ़ से लिये जानी वाली शपथ में ख़त्म-ए-नबूवत से जुड़े बदलाव को लेकर पाकिस्तान में मज़हबी कट्टरपंथी गुटों ने बहुत नाराज़गी दिखाई थी। दबाव में आकर सरकार ने एक्ट में किये गये बदलाव को रद्द करके फिर से पहले वाली शपथ ही लागू कर दी थी।

लेकिन तहरीक-ए- लब्बैक या रसूल अल्लाह और ख़ादिम हुसैन रिज़वी इससे ही संतुष्ट नहीं थे। उनकी एक और प्रमुख माँग यह भी थी कि क़ानून मन्त्री ज़ाहिद हामिद को फ़ौरी तौर पर अहुदे से हटाया जाये। सरकार इसके लिये राज़ी नहीं हो रही थी।

प्रदर्शनकारी रावलपिण्डी से इस्लामाबाद जा रहे मुख्य मार्ग को फैज़ाबाद इन्टरचेंज पर रोक कर बैठे हुये थे। इससे रावलपिण्डी और इस्लामाबाद में जीवन कुछ हद तक अस्त-व्यस्त हो गया था।

सरकार साफ़ तौर पर कट्टरपंथी गुटों के दबाव में थी। महज़ दो हज़ार लोगों के इस सड़क-जाम प्रदर्शन को रोकने के लिये सरकार कोई कदम उठाने से हिचकिचाहट दिखाती रही।

अदालत से डांट खाने के बाद सरकार ने इस शनिवार धरना हटाने के लिये पुलिस का इस्तेमाल किया। कुल छह लोगों की मौत हो गयी। लाहौर, पेशावर, और कराची समेत कई और जगहों पर भी प्रदर्शन होने लगे। कल इतवार को भी हिंसा की घटनाएं होती रहीं। इसके बाद इस्लामाबाद के इस धरने में प्रदर्शनकारियों की तादाद बढ़ कर तक़रीबन पाँच हज़ार हो गयी थी।

अफ़वाहों को फैलने से रोकने के लिये सरकार ने पूरे पाकिस्तान में प्राइवेट टीवी चैंनलों और फेसबुक समेत सोशल मीडिया पर फ़ौरी तौर पर पाबन्दी लगा दी।

सरकार ने चाहे फ़ौज को बुला लिया था, लेकिन फ़ौज ने लोगों के ख़िलाफ़ ताक़त का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया।

फ़ौज के इशारे को समझते हुये दबाव में आई सरकार ने प्रदर्शनकारियों की माँगों के आगे झुकना ही सही समझा और क़ानून मन्त्री ज़ाहिद हामिद ने अपने अहुदे से इस्तीफ़ा दे दिया। प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ सभी मुकद्दमे वापिस ले लिये जाने की मांग भी सरकार ने मान ली है। साथ ही इलेक्शन एक्ट में ख़त्म-ए-नबूवत से जुड़े बदलाव के लिये ज़िम्मेदार लोगों की निशानदेही करके उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिये एक समिति बनाने का भी ऐलान सरकार ने किया है। प्राइवेट टीवी चैंनलों और फेसबुक समेत सोशल मीडिया पर लगी पाबन्दी हटा ली गयी है।

ज़ाहिर सी बात है कि पाकिस्तान में कम ही जानी जाती जमात ‘तहरीक-ए- लब्बैक या रसूल अल्लाह’ इस धरने की कामयाबी के बाद अब पहले से कहीं ज़्यादा ताक़तवर हो सकती है। इसके रहनुमा ख़ादिम हुसैन रिज़वी अपने बेहद भड़काऊ भाषणों के लिये जाने जाते हैं। धरने की कामयाबी के बाद लोगों में उनका प्रभाव और बढ़ने की सम्भावना है।

ख़ादिम हुसैन रिज़वी के बुलन्द हौसले को इसी बात से जाना जा सकता है कि आज जब रिज़वी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे, तो उनको टीवी चैनलों पर लाइव न दिखाये जाने से नाराज़ होकर उन्होंने पत्रकारों को कुछ देर के लिये बन्धक भी बना लिया। टीवी चैनल सरकारी पाबन्दी की वजह से उनको लाइव नहीं दिखा सकते थे। सुरक्षा बलों के दख़ल के बाद ही पत्रकारों को छोड़ा गया।












धर्मांतरण की धमकी












(अमृत पाल सिंघ ‘अमृत’)

भारत में धर्मांतरण की धमकी अब दबाव डालने का साधन बनती जा रही है। ऐसी धमकी परम्परागत भारतीय समाज पर दबाव बनाने में कामयाब होती भी दिख रही है।

या शायद भारतीय समाज को, यह इस तरह कह लीजिये कि हिन्दू-सिख समाज को समझने में मैं ही कोई ग़लती कर रहा हूँ। शायद बात ऐसी है कि मैं ख़ुद परम्परागत हिन्दू-सिख समाज की मर्यादा को अपने कन्धों पर उठाये घूमता हूँ और यह समझ नहीं पा रहा कि परम्परागत हिन्दू-सिख समाज और ‘आधुनिक’ हिन्दू और सिख समाज में कुछ अन्तर है।

कोई हिन्दू-सिख अपना धर्म छोड़कर कोई दूसरा मज़हब अपनाना चाहता था, तो परम्परागत हिन्दू-सिख समाज कोई शोर नहीं मचाता था। बस उसके लिये अपने दरवाज़े बन्द कर लेता था। तब शायद उनको वोट की राजनीति की परवाह नहीं होती थी। तब उनको अपने-आप पर, अपने धर्म-सिद्धांतों पर पूरा भरोसा हुआ करता था।

आज वोट की राजनीति ने ‘आधुनिक’ हिन्दू-सिख समाज को यह अहसास दिलाना शुरू कर दिया है कि वोटों के इस युग में सिद्धांत नहीं, बल्कि संख्या-बल ही ज़्यादा ताक़तवर है।

तीसरी गोल-मेज़ कॉन्फ्रेंस की असफलता के बाद उस वक़्त के ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने 1932 में ब्रिटिश इण्डिया के लिये ‘कम्युनल अवार्ड’ (Communal Award) दिया। इस कम्युनल अवार्ड ने एक ‘भारतीय समाज’ को ‘अगड़ी जाति, ‘पिछड़ी जाति, ‘मुसलमान’, ‘सिख’, ‘भारतीय ईसाई’, ‘एंग्लो-इण्डियन’, और ‘दलित’ में बाँट कर रख दिया।

उस वक़्त यरवदा जेल में बन्द गान्धी जी ने कम्युनल अवार्ड का विरोध किया, लेकिन डॉक्टर भीमराव अंबेडकर साहिब से ‘पूना पैक्ट’ कर के ही संतुष्ट हो गये।

1932 के कम्युनल अवॉड से बंटा भारतीय समाज 1947 में दो अलग-अलग देशों के रूप में बंट कर ही रहा।

बीसवीं सदी ने देखा कि मज़हबों और जातियों की वजह से हमारा समाज बंट गया। समाज के इस बटवारे को सरकारी मानता प्राप्त है। समाज के इस तरह के बटवारे ने हमें अंतर्द्वंद्व से मुक्त होने ही नहीं दिया।

समाज के इस बटवारे से हिन्दू, सिख समाज के कर्णधार त्रस्त हैं। समाज के कुछ लोग जब ‘धर्मांतरण’ करके समाज को छोड़ देने की धमकी देते हैं, तो कर्णधार भयभीत हो जाते हैं।

बात की भूमिका लम्बी हो गयी है। बात को संक्षेप करता हूँ।

पंजाब में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी ने गुरुद्वारा गुरुसर, मधोके बराड़ के 15 कर्मचारियों को हटा दिया। हटाये गये इन कर्मचारियों ने धमकी दी है कि अगर उन्हें नौकरियों पर दुबारा नहीं रखा गया, तो वे अपने परिवारों समेत सिख धर्म को छोड़कर दूसरा मज़हब धारण कर लेंगे और सिख धार्मिक चिन्ह श्री अकाल तख़्त साहिब को लौटा देंगे।

यह धमकी उन्होंने श्री अकाल तख़्त के जत्थेदार साहिब को मिलकर भी दी है।

धर्म का सम्बन्ध अध्यात्म से होता है। धर्म को आध्यात्मिक लाभ हासिल करने के लिये धारण किया जाता है, नौकरियाँ प्राप्त करने के लिये नहीं। महज़ नौकरी की वजह से धर्मांतरण करना या धर्मांतरण की धमकी देना किसी धार्मिक व्यक्ति का काम नहीं है।

इतिहास में एक ज़िक्र मिलता है। श्री आनंदपुर साहिब की आख़िरी लड़ाई में आनन्दपुर साहिब शहर को पिछले कई महीनों से दुश्मन सेना ने घेरा हुआ था। बहुत सारे सिख लम्बी लड़ाई से तंग आ चुके थे। वे अपने घरों को वापस जाना चाहते थे। कई सिख श्री गुरु गोबिंद सिंघ साहिब से निवेदन कर रहे थे कि लड़ाई ख़त्म की जाये।

गुरु साहिब ने कहा कि जो यहाँ से जाना चाहें, वह जा सकते हैं, लेकिन जाने से पहले वे यह लिख कर दे जाएं कि ‘आप हमारे गुरु नहीं, हम आपके सिख (शिष्य) नहीं।’

इतिहास कहता है कि उन सिखों ने गुरु साहिब को यह लिखत में दिया, “आप हमारे गुरु नहीं, हम आपके सिख (शिष्य) नहीं”। और, वे गुरु साहिब को छोड़कर चले गये।

भारतीय परम्परा हमें यह आज़ादी देती है कि हम अपनी मर्ज़ी से धार्मिक वजह से किसी पन्थ में शामिल भी हो सकते हैं और उसको छोड़ भी सकते हैं। लेकिन वर्तमान स्थिति में किसी पन्थ को धारण करने या छोड़ने के पीछे धार्मिक कारण न होकर आर्थिक और राजनीतिक कारण हैं। आर्थिक या राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिये धर्मांतरण को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा है। धर्मांतरण की धमकी अब दबाव डालने का साधन बनती जा रही है।

धार्मिक नेताओं पर अब दबाव है। क्या वे इस दबाव के आगे झुक जाएंगे?

News Source:

(1). http://www.tribuneindia.com/mobi/news/punjab/sgpc-sacks-15-back-door-employees-posted-in-ajnala/502581.html
(2). http://www.tribuneindia.com/mobi/news/punjab/sacked-sgpc-employees-knock-on-akal-takht-door/503136.html












मुबाशिर जमील को सज़ा












(अमृत पाल सिंघ ‘अमृत’)

भाई तो कहता रहा कि उसको ग़ैबी आवाज़ें सुनाई देती हैं। भाई तो कहता रहा कि उसको कोई जिन्न चिमड़ा हुआ है। भाई तो कहता रहा कि वह जिन्न निकलवाने ही सीरिया जाना चाहता था।

इंग्लैंड के इन जज साहिब, जिनका नाम पीटर रूक है, ने भाई की बात पर बिल्कुल भी यक़ीन नहीं किया और दहशतगर्दी की तैयारी करने के जुर्म में भाई को कल छह साल क़ैद की सज़ा सुना दी।

इस भाई का नाम है मुबाशिर जमील। उम्र है 22 साल। 2 साल का था, जब पाकिस्तान से इंग्लैंड आ गया था अपने परिवार के साथ।

पिछले कुछ वक्त से इंटरनेट पर इस्लामिक स्टेट की बनाई वीडिओज़ देख-देख कर मुबाशिर जमील के दिल में शहीद होने की तमन्ना पैदा हो गई थी।

उसने इंटरनेट पर इस्लामिक स्टेट ग्रुप की गाइडेंस पढ़ी। उसी के अनुसार चलते हुये एक ग़ैर-मुस्लिम देश में इस्लामिक स्टेट ग्रुप का सीक्रेट एजेंट बनने के लिये अपनी पहचान बदल के अपनी दाढ़ी शेव करा दी और तुर्की तक पहुँचने की प्लानिंग बनाने लगा।

जमील इस्लामिक स्टेट ग्रुप के एक हैंडलर अबू हसन के सम्पर्क में आया। अबू हसन ने उससे उसके पासपोर्ट की कॉपी, उसकी तस्वीरें, और तुर्की के लिये फ्लाइट की टिकट की कॉपी ले ली। तुर्की के लिये उसकी फ्लाइट 30 अप्रैल, 2016 को थी।

जमील ने अबू हसन को कहा, “अगर तुम या कोई और भाई मुझे धमाके वाली आत्मघाती जैकेट डाल दे और बता दे कि इसका बटन कैसे दबाना है, तो मैं इंग्लैंड में कोई अच्छा टारगेट ढूँढ कर चाहे कल ही कुछ कर सकता हूँ।”

जमील ल्युटन शहर के अपने घर में बैठा अबू हसन से चैट कर रहा था कि तभी आतंकवाद निरोधक अफ़सर दरवाज़ा तोड़कर उसके घर में घुस गये और जमील को अबू हसन से चैट करते रंगे हाथों पकड़ लिया। तुर्की के लिये उसकी फ्लाइट 30 अप्रैल, 2016 को थी और उसको उससे पहले ही 27 अप्रैल को ग्रिफ्तार कर लिया गया।

मुक़द्दमा चलने पर ही मुबाशिर जमील को यह पता चला कि अबू हसन इस्लामिक स्टेट ग्रुप का बन्दा न होकर ब्रिटिश ख़ुफ़िया एजेंसी का एजेंट था।

कोर्ट में चले मुक़द्दमे में उसके बचाव में यह कहा गया कि जमील दिमाग़ी तौर पर बीमार है। इस पर भी जज साहिब ने कोई छोट नहीं दी और कहा कि अगर उसको इलाज की ज़रूरत है, तो छह साल क़ैद की सज़ा का कुछ हिस्सा वह सुरक्षित हस्पताल में गुज़ार सकता है।

छह साल की क़ैद के बाद जमील को अगले पाँच साल पुलिस की निगरानी में गुज़ारने पड़ेंगे।

देखने वाली बात यह होगी कि जेल में वक़्त गुज़ारने के बाद क्या जमील को चिमड़ा जिन्न निकल जायेगा।

News Source: http://www.tribuneindia.com/mobi/news/world/pakistan-born-man-jailed-for-terror-plot-in-uk/502432.html












कटास राज की संभाल न करने के लिये सरकार को लताड़












(अमृत पाल सिंघ ‘अमृत’)

कल 23 नवम्बर, 2017 को पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने पोठोहार के इलाके के प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ कटास राज मन्दिर परिसर में स्थित सरोवर की उचित संभाल न कर पाने के लिये सरकार को लताड़ लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को कहा है कि एक हफ़्ते के अन्दर-अन्दर कटासराज मन्दिर के सरोवर को पानी से भरा जाये, चाहे यह पानी मशकों में ही भर-भर के लाना पड़े।

पाकिस्तानी पंजाब के ज़िला चकवाल में स्थित कटासराज मन्दिर परिसर कटास सरोवर के इर्दगिर्द बने मन्दिरों का समूह है। ऐसा विश्वास है कि यह सरोवर मूलतः शिवजी के आँसुओं से बना था, जब वह अपनी पत्नी सती की मृत्यु पर दुःखी थे।

पोठोहारी हिन्दू परम्परा के अनुसार इसी सरोवर के किनारे पाण्डव युधिष्ठिर ने यक्ष के प्रश्नों के उत्तर दिये थे। परम्परा से चले आ रहे विश्वास के अनुसार मुख्य मन्दिर की आधारशिला श्री कृष्ण भगवान ने रखी थी।

वर्तमान मन्दिर परिसर का निर्माण हिन्दूशाही राज के दौरान सातवीं शताब्दी में हुआ था। तब से लेकर अगस्त 1947 तक यह शैव पन्थ का पोठोहार में केन्द्र रहा है। यहाँ का शिवरात्रि का मेला पोठोहार से बाहर तक के इलाक़ों में मशहूर था।

मार्च, 1947 में पोठोहार के हिन्दू-सिख क़त्लेआम के बाद पूरे पोठोहार से हिन्दू-सिखों का पलायन शुरू हो गया था। अगस्त के महीने तक लगभग सभी हिन्दू, सिख पोठोहार छोड़कर भारत चले गये। 15 अगस्त, 1947 को कटासराज मन्दिर परिसर पर दंगाइयों ने हमला करके मन्दिरों में तोड़फोड़ की और मूर्तियों को बाहर फेंक दिया था।

पिछले कुछ सालों से मन्दिर परिसर में धार्मिक गतिविधियाँ फिर से शुरू हुई हैं। पाकिस्तान की सरकार ने परिसर के विकास के लिये कुछ धन ख़र्च किया है। भारत से धार्मिक मूर्तियाँ लाकर यहाँ स्थापित की गयीं हैं।

नज़दीक की सीमेंट फैक्ट्रियों के द्वारा धरती से पानी निकालते रहने की वजह से ज़मीनदोज़ (अंडरग्राउंड) पानी की कमी के चलते सरोवर का पानी भी सूखने लगा है।

अख़बारों में सरोवर के पानी के सूखने की ख़बरों के बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस मियां साकिब निसार ने यह मुद्दा उठाया और कहा कि यह मन्दिर सिर्फ़ हिन्दुओं के लिये ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की क़ौमी विरासत का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि हिन्दुओं के हक़ों की हिफ़ाज़त के लिये अदालत किसी भी हद तक जा सकती है। मामले की पड़ताल के लिये उन्होंने एक कमेटी का गठन किये जाने का भी हुक्म दिया।

व्यक्तिगत तौर पर मेरी राय है कि पाकिस्तान की सरकार को चाहिये कि धार्मिक यात्राओं के लिये भारत के हिन्दुओं और सिखों को खुले दिल से वीज़ा दे। जैसे पाकिस्तान के गुरुद्वारों के लिये प्रबन्धक समिति बनाई गई है, इसी तरह से हिन्दू मन्दिरों के लिये भी समिति बनाई जाये। भारत और दूसरे देशों के हिन्दू उस समिति को दान दें।

धार्मिक यात्रा के लिये सरकारी मन्ज़ूरी वाले जत्थे का हिस्सा बनने की शर्त नहीं होनी चाहिये, बल्कि किसी भी ऐसे हिन्दू और सिख परिवार को फौरन 15 दिन का वीज़ा दिया जाना चाहिये, जो धार्मिक उद्देश्य से पाकिस्तान जाना चाहते हैं।

News Source: http://www.tribuneindia.com/mobi/news/world/fill-katas-raj-temple-pond-with-water-in-a-week-pak-sc-to-govt/502824.html












कोई मर्सिया लिखूँ । पाकिस्तान की स्थापना ।












#पाकिस्तान_की_स्थापना । #हिन्दू_सिख_क़त्लेआम ।

मेहरबानी करके पूरी विडियो देखें/सुनें। इस विडियो के कुछ नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* दिल चाहता है कि कोई मर्सिया लिखूँ। दूर किसी उजाड़ में बैठ कर अपना लिखा मर्सिया धीरे-धीरे से गाऊँ मैं। जब भी कभी मर्सिया लिखने बैठता हूँ, लिख नहीं पाता। लफ़्ज़ ही नहीं मिलते।

* कभी-कभी हो जाता है कि अल्फ़ाज़ हमसे बेवफ़ाई कर जाते हैं। हम कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन लफ़्ज़ साथ नहीं देते। कुछ बातें इतनी बड़ी होती हैं कि डिक्शनरी भी छोटी लगने लगती है। कुछ दर्द इतने भारी होते हैं कि सारे लफ़्ज़ मिलकर भी उन दर्दों का भार बर्दाश्त नहीं कर सकते।

* दर्द ने कितनों को गूँगा बना दिया। दर्द ने कितनों की आखों से इतने आँसू बहाये कि वो आँखें बन्जर ज़मीन की तरह हो गईं, जिसमें फिर कोई ख़्वाब नहीं उगा। दर्द ने कितनों की ज़िन्दगी को इतना बोझल बना दिया कि जीना भी एक लम्बी सज़ा हो गया।

* जब ज़ुबान साथ न दे, तो बस आँखों से ही बोलना सीखना पड़ता है। जब दूसरा अपना दर्द बयान न कर सके, तो उसके चेहरे से ही पढ़ लेने का हुनर सीखना पड़ता है। जानवर कहाँ बोल पाते हैं हमारी बोली? फिर भी हम कुछ न कुछ तो समझने की कोशिश करते ही हैं उनके दर्द को। फिर ऐसा क्यों कि हम अपने ही उन लोगों के दर्द को समझ नहीं पाते, जो 1947 में मज़हब का नक़ाब पहने बैठी सियासत के हाथों बर्बाद हो गये? वो गूंगे हो गये थे अपना दर्द बयान करते-करते। जिनकी खुशियों को सियासी ताक़त के भूखे भेड़िये खा गये थे, वो ख़ुद रोटी-रोटी को मोहताज हो गये थे। जिनकी नन्हीं नाज़ुक कलियों-सी बच्चियों को हैवान खा गये थे, उनमें इतनी हिम्मत ही कहाँ बची थी कि कुछ बता पाते। और उनके बिना बताये ही उनकी बात समझने वाले भी तब कहाँ मिलते?

* अब तो 70 साल हो गये। बहुत वक़्त बीत चुका। चलो, अब तो मैं उनका मर्सिया गा लूँ। चलो, अब तो मैं उनकी कथा कह लूँ। कोई पुराण लिख दूँ मैं उनका। बिना कृष्ण वाली कोई नई महाभारत लिख दूँ मैं। एक सीता जी के अग़वा पर हज़ारों रामायणें लिखीं ऋषियों ने। 1947 की हज़ारों सीता माताओं पर कोई आधी रामायण ही लिख दूँ मैं।

* लेकिन, लिख ही नहीं पाता हूँ मैं। कह ही नहीं पाता हूँ मैं। उन्नीस सौ सैंतालीस लिख कर ही रुक जाता हूँ। उन्नीस सौ सैंतालीस कह कर ही चुप हो जाता हूँ मैं।

* पोठोहार की एक-दो नहीं, बल्कि हज़ारों बेटियाँ बटवारे की बलि चढ़ा दी गईं। बहुत ख़ूबसूरत, मीठा बोलने वाली, बड़ी सलीक़े वाली, सुबह उठकर गुरुद्वारों और मन्दिरों में जाने वालीं, आँखों में ख़ाब बुनती रहने वाली वो लाडलिआँ नहीं जानती थीं कि उस दौर में उस जगह पर उनका हिन्दू और सिख होना ही बहुत बड़ा गुनाह हो गया था। पोठोहार के गांवों की वो चिड़ियाँ थीं। पोठोहार की वो कुड़ियाँ थीं। मेरी क़ौम की वो बेटियाँ थीं। हमारी पगड़ियाँ थीं वो।

* अपने ख़ानदान के लोगों को उन्होंने बहादुरों की तरह धर्म पर मरते देखा था। अपनी इज़्ज़त को बचाने की कोशिश में कूंओं में कूद कर जान दे देने वाली उन पोठोहारणों के आगे आज के हम लोग बहुत बौने हैं।

* मेरी आज की उदास शाम उन्हीं के नाम है। मेरी गुनाहगार आँखों में तैरते आँसू उन्हीं की याद को अर्पित हैं।












भाग 4 – पोठोहार में हिन्दू-सिख क़त्लेआम । पाकिस्तान की स्थापना ।












#पाकिस्तान_की_स्थापना । #हिन्दू_सिख_क़त्लेआम ।

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* दिसम्बर, 1946 और जनवरी, 1947 में हज़ारा में और मार्च, 1947 में पोठोहार में हिन्दुओं और सिखों के साथ जो हुआ, वही कुछ अगस्त का महीना आते-आते ईस्ट पंजाब में मुसलमानों के साथ होना शुरू हो गया। हज़ारा और नॉर्थवेस्टर्न फ्रंटियर प्रोविन्स के दूसरे हिस्सों, पोठोहार और वेस्ट पंजाब के दूसरे हिस्सों, और सिन्ध से लाखों हिन्दू और सिख रिफ्यूजी ईस्ट पंजाब में अमृतसर, फिरोज़पुर, जालंधर, पटियाला वग़ैरह जगहों पर पहुँच चुके थे। हज़ारा के क़त्लेआम के बाद वहाँ के हज़ारों हिन्दू-सिख तो जनवरी, 1947 में ही रिफ्यूजी कैम्पों में पहुँच चुके थे। मार्च, 1947 के पोठोहार क़त्लेआम के बाद वहाँ से बहुत हिन्दू-सिख ईस्ट पंजाब चले गये थे। लाहौर से भी जून के बाद बहुत हिन्दू-सिख ईस्ट पंजाब पहुँच रहे थे।

* ईस्ट पंजाब के शहरों, कस्बों, गाँवों, हर जगह हिन्दू-सिख शरणार्थी दिख रहे थे। वो शरणार्थी जहाँ-जहाँ जाते, अपने पर हुये ज़ुल्मों की दास्तानें सुनाते। इससे ईस्ट पंजाब के बहुत सारे हिन्दुओं और सिखों में ग़ुस्सा फैलने लगा और वो लोग बदले की भावना से भरने लगे। पंजाब की पुलिस में मुस्लिम मेजोरिटी थी, जिसकी वजह से ईस्ट पंजाब में मुसलमानों पर बड़े लेवल पर हमले नहीं हुये थे। लेकिन अगस्त में फ़ौज की तरह पुलिस भी इण्डिया और पाकिस्तान में बाँट दी गयी। मुसलमान पुलिसवाले पाकिस्तान जाना शुरू हो गये। इससे ईस्ट पंजाब के दंगाइयों के हौसले बढ़ गये। उन्होंने बड़ी प्लानिंग से मुसलमानों पर हमलों करने शुरू कर दिये। बड़ी प्लानिंग से फण्ड इकट्ठे किये गये और दंगाइयों को हथियार और दूसरा सब सामान मुहैया कराया गया।

* ईस्ट पंजाब में शुरू हुये मुसलमानों के क़त्लेआम से बच निकले मुसलमान रिफ्यूजीज़ पाकिस्तान के दूसरे इलाक़ों की तरह पोठोहार में भी पहुँचने शुरू हुये। उन्होंने वहाँ पहुँचकर अपने साथ हुये ज़ुल्मों की बातें बताना शुरू किया। उन्होंने अपने ख़ानदान के लोगों के क़त्लों के बारे में बताया। उन्होंने अपनी औरतों के अग़वा होने की बातें बताईं। उन्होंने अपने माल-असबाब लूटे जाने की बातें बताईं। उनको उनके घरों से जबरी निकाले जाने की बातें बताईं। इससे वहाँ के मुसलमानों में ग़ुस्सा फैल गया। ईस्ट पंजाब में हो रहे मुसलमानों के क़त्लेआम का बदला अब पोठोहार के बचे-खुचे हिन्दुओं और सिखों से लिया जाने लगा।

* मार्च, 1947 में हिन्दू-सिखों पर हमले करने के जुर्म में जो लोग जेलों में थे, उनको पाकिस्तान बनते ही रिहा कर दिया गया। जेल से बाहर आये वो दंगाई इसको इस बात का संकेत मानने लगे कि हिन्दुओं, सिखों पर हमले करने, क़त्ल करने, रेप करने, और लूटपाट करने की उनको खुली छुटी है।

* पोठोहार में हुये अगस्त, सितम्बर के क़त्लेआम के बारे में कुछ ख़ास डेटा नहीं मिलता। इससे बहुत लोग इस ग़लतफ़हमी में रह जाते हैं कि पोठोहार में हिन्दुओं, सिखों का क़त्लेआम ख़ास तौर पर मार्च, 1947 में ही हुया था। ऐसा ख़्याल बिल्कुल ग़लत है। अगस्त, सितम्बर के क़त्लेआम के बारे में कुछ ख़ास डेटा नहीं मिलने की वजह यह है कि अगस्त, सितम्बर के क़त्लेआम में से इतने हिन्दू और सिख भी नहीं बच सके, जो क़त्लों के बारे में कुछ बता पाते।

* मेरे दादा जी, और दूसरे कई और बुज़ुर्ग रिश्तेदारों की बताई क़त्लेआम की कई वारदातें किसी भी लिस्ट में नहीं मिलती हैं। इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि ज़्यादा घटनाओं को दर्ज ही नहीं किया गया।

* जो मज़लूम हिन्दू, सिख पाकिस्तान के कबाइली इलाक़ों से निकलकर भारत आने की बजाय अफ़ग़ानिस्तान चले गये, उनके साथ क्या-क्या ज़ुल्म हुये, इसका ज़िक्र किसी ने भी नहीं किया। आपको शायद एक भी ऐसा लेखक नहीं मिलेगा, जिसने अफ़ग़ानिस्तान गये हिन्दू, सिखों की बात लिखी हो।

* 15 अगस्त को पाकिस्तान एक अलग मुल्क के तौर पर वजूद में आया। उसी सुबह रावलपिण्डी में कुछ हिन्दुओं, सिखों को छुरे मारे गये। अगले दिन करतारपुरा मुहल्ले में कई हिन्दू-सिख क़त्ल कर दिये गये। 17 अगस्त को ख़ालसा कॉलेज और ख़ालसा स्कूल पर हमला करके वहाँ तोड़फोड़ की गई।

* 18 अगस्त को ईद थी। ईद की नमाज़ पढ़ने के बाद दंगाइयों की भीड़ें शहर के अलग-अलग हिस्सों में फैल गयीं और हिन्दू-सिखों को क़त्ल करना शुरू कर दिया था। हिन्दू-सिखों के घरों और दुकानों को लूट लिया गया। गुरुद्वारों और मन्दिरों पर हमले किये गये। गुरु ग्रन्थ साहिब को आग लगा दी गयी और मन्दिरों की मूर्तियों को तोड़ दिया गया।

* 11 सितम्बर को तक़रीबन 200 नॉन-मुस्लिम मिलिट्री की हिफ़ाज़त में 11 ट्रकों में सवार हो कर रावलपिण्डी से रवाना हुये। उनको रोककर दो बार उनकी बारीकी से तलाशी ली गयी। जब वो रावलपिण्डी से तक़रीबन 6 मील की दूरी तक ही गये थे, तो उनपर हथियारबन्द लोगों ने हमला कर दिया। इन 11 ट्रकों की हिफ़ाज़त के लिये साथ गयी मिलिट्री के लोग सड़क के किनारे बैठ गयी और इन हिन्दुओं-सिखों की कोई मदद नहीं की। इन 11 ट्रकों में से 2 ट्रक तो अपने लोगों को लेकर वापस रावलपिण्डी जाने में कामयाब रहे। बाक़ी के 9 ट्रकों के तक़रीबन सभी लोगों का क़त्लेआम कर दिया गया। कई लड़किओं को अग़वा कर लिया गया।












भाग 3 – पोठोहार में हिन्दू-सिख क़त्लेआम । पाकिस्तान की स्थापना ।












#पाकिस्तान_की_स्थापना । #हिन्दू_सिख_क़त्लेआम ।

मेहरबानी करके पूरी विडियो देखें/सुनें। इस विडियो के कुछ नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* 9 मार्च को धामली पर हमला हुआ। हिन्दुओं-सिखों ने जब फायरिंग की, तो हमलावर भाग गये। अगले दिन फिर हमला हुआ। हिन्दुओं-सिखों की फायरिंग के बाद हमलावर फिर भाग खड़े हुये। 12 मार्च को बहुत बड़ी भीड़ ने हमला किया और घरों को आग लगाना शुरू कर दिया। गाँव के एक हिन्दू ने अमन-शान्ति की बातचीत शुरू की। हमलावरों ने हमला रोकने के बदले 14 हज़ार रुपये की माँग की। उनको 14 हज़ार रुपये दे दिये गये और वो वापस चले गये। उन दिनों 14 हज़ार रुपये बहुत बड़ी रक़म हुआ करती थी।

* लेकिन अगले ही दिन हमलावर फिर आ गये। अब हिन्दू और सिख जो भी हथियार मिला, लेकर हमलावरों पर टूट पड़े। तक़रीबन 500 हिन्दू-सिख यहाँ शहीद हुये। कुछ ही लोग बच सके। जैसा कि पोठोहार में बाक़ी जगहों पर भी हुआ, हिन्दू-सिखों का क़त्लेआम हो जाने के बाद मिलिट्री भी पहुँच गयी।

* कहुटा तहसील में नारा गाँव में सिखों की मेजोरिटी थी। 9 मार्च शाम को इस गाँव को दंगाइयों ने घेरना शुरू किया। रात को गाँव पर हमला कर कुछ घरों को आग लगा दी गयी। अगले दिन 10 मार्च को भी हिन्दू-सिखों पर हमले, लूट, और आगज़नी जारी रही। सिख और हिन्दू मुक़ाबला करते रहे। 11 मार्च तक दंगाइयों की तादाद बढ़ कर हज़ारों में हो गयी। हमले और तेज़ गये। हमलावर गाँव के अन्दर तक आने में कामयाब हो गये। कई सिख औरतों और बच्चों को जलते घरों में फेंक कर ज़िंदा जला दिया गया। औरतों पर ऐसे-ऐसे ज़ुल्म किए गये, जिन का ब्यान करना भी मुश्किल है। कई औरतों ने कुएँ में कूदकर जान दे दी।

* हरियाल में 9 मार्च को ही तक़रीबन 20 सिखों के क़त्ल हुये। 40 को अग़वा किया गया। गुरुद्वारा जला दिया गया।
हरियाल मास्टर तारा सिंघ का पुश्तैनी गाँव है। दंगाइयों ने अपनी नफ़रत का खुला मुज़ाहरा करते हुये मास्टर तारा सिंघ के घर को बिल्कुल तोड़ कर गिरा दिया। फिर उस जगह पर जूते मारकर उन्होंने अपने ग़ुस्से की नुमाइश की।

* रावलपिण्डी के मंडरा गाँव मे 9 मार्च को एक बड़ा क़त्लेआम हुया, जिसमें 200 हिन्दू और सिख शहीद हुये। सिखों और हिन्दुओं की दुकानों और घरों को लूटकर जला दिया गया। गुरुद्वारा साहिब और स्कूल को भी आग लगा दी गयी। 40 लापता हो गए, जो शायद गाँव से भाग हुये रास्ते में कहीं क़त्ल कर दिये गए।

* 10 मार्च को बेवल गाँव को दंगाइयों की एक बड़ी भीड़ ने घेर लिया। इस गाँव में तक़रीबन 400 सिख रहते थे और कुछ आबादी हिन्दूओं और मुसलमानों की भी थी। जब हमला हुआ, तो गाँव में मौजूद 400 के क़रीब हिन्दू और सिख गुरुद्वारे और गुरुद्वारे के आसपास कुछ घरों में चले गये। दंगाइयों ने गुरुद्वारे को घेर कर उसमें आग लगा दी। आसपास को भी आग लगा दी। गुरुद्वारे और आसपास के घरों में पनाह लिये बैठे सभी के सभी हिन्दू और सिख इनमें ज़िन्दा ही जल कर मर गये। जो हिन्दू और सिख पकड़े गये, उनको बहुत तसीहे दिये गये। एक सिख मुकन्द सिंघ की दोनों आँखें निकाल ली गईं। फिर उसको टाँगों से पकड़कर तब तक घसीटते रहे, जब तक वह मर न गया।

* 10 मार्च को दंगाइयों ने दुबेरण को घेर लिया। हिन्दू और सिख गुरुद्वारे में चले गये। ख़ाली पड़े घरों को दंगाइयों ने लूटकर जला दिया। कुछ सिखों के पास बन्दूकें थी, जिससे उन्होंने गुरुद्वारे से कुछ देर मुक़ाबला किया। गोलियां ख़त्म होने पर वो मुक़ाबला भी बन्द हो गया। हमलावरों ने उनको सरेंडर करने को कहा। उन्होंने वादा किया कि उनको मारा नहीं जायेगा और औरतों को बेइज़्ज़त नहीं किया जायेगा। इसपर तक़रीबन 300 हिन्दू, सिख गुरुद्वारे से बाहर आ गये। उन सभी को बरकत सिंघ के घर पर ले जाया गया। रात को हमलावरों ने उस घर पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी। घर के अन्दर मौजूद सभी हिन्दू, सिख ज़िन्दा ही जल कर मर गये।

* अगली सुबह हमलावरों ने गुरुद्वारे पर फिर से हमला करके गुरुद्वारे के दरवाज़े तोड़ दिये। अन्दर मौजूद कई सिख अब हाथों में तलवारें लेकर बाहर निकले और दंगाइयों पर टूट पड़े। सभी लड़ते-लड़ते शहीद हो गये। दंगाइयों ने बाक़ी सिखों और हिन्दुओं को भी क़त्ल कर दिया। इस गाँव से कुछ ही हिन्दू, सिख ज़िन्दा बच सके थे। इस गाँव की 70 औरतों को अग़वा कर लिया गया।

* मछिआं गाँव पर हमला 11 मार्च को हुआ। यहाँ तक़रीबन 200 लोगों का क़त्लेआम हुआ। औरतों और बच्चों को अग़वा कर लिया गया। गुरुद्वारे को आग लगा दी गई।

* रावलपिण्डी के मशहूर गाँव धुडियाल पर पहला हमला 12 मार्च को हुआ, जिसका मुक़ाबला हिन्दुओं और सिखों ने बड़ी कामयाबी से किया। अगले दिन 13 मार्च की शाम को दुबारा ज़बरदस्त हमला किया गया। हिन्दुओं और सिखों के ज़्यादातर घर, 4 गुरुद्वारे, ईरान-हिन्द बैंक, और ख़ालसा हाई स्कूल जला दिये गये। 8 सिख इस हमले में शहीद हुये। मिलिट्री के आने से दंगाई भाग गये। यहाँ यह ख़्याल रहे कि तब तक सांझा मिलिट्री थी। तब तक पाकिस्तान बनाये जाने का ऐलान ब्रिटिश हुकूमत की तरफ़ से नहीं हुआ था।

* हिन्दुओं-सिखों के उस क़त्लेआम की मुहम्मद अली जिन्नाह समेत मुस्लिम लीग के किसी भी बड़े रहनुमा ने निन्दा नहीं की, मज़म्मत नहीं की, हालांकि अमन कायम करने की अपील ज़रूर जिन्नाह ने की। अमन करने के लिये कहना अलग बात है और हज़ारों बेगुनाहों के क़त्ल की मज़म्मत करना, उस पर ग़म का इज़हार करना अलग बात है।

* मार्च के क़त्लेआम के बाद रावलपिण्डी समेत पोठोहार के इलाके में बाक़ी बचे हिन्दुओं और सिखों के क़त्लेआम का दूसरा दौर अगस्त के महीने में चला।












भाग 2 – पोठोहार में हिन्दू-सिख क़त्लेआम । पाकिस्तान की स्थापना ।












#पाकिस्तान_की_स्थापना । #हिन्दू_सिख_क़त्लेआम ।

मेहरबानी करके पूरी विडियो देखें/सुनें। इस विडियो के कुछ नुक्ते इस प्रकार हैं: –

* पंजाब के दूसरे हिस्सों, या पूरे भारत में कहीं भी मार्च, 1947 में पोठोहार के हिन्दू-सिखों के क़त्लेआम के जवाब में फ़ौरी तौर पर हिन्दुओं या सिखों की भीड़ों ने कोई दंगा नहीं किया। हिन्दुओं या सिखों की भीड़ों ने कोई दंगा दिसम्बर 1946 / जनवरी 1947 में नॉर्थवेस्टर्न फ्रंटियर प्रोविन्स के हज़ारा डिवीज़न में हुये हिन्दुओं-सिखों के क़त्लेआम के बाद भी नहीं किया था। हज़ारा से भाग कर हज़ारों हिन्दू-सिख शरणार्थी पंजाब में ही गये थे। पंजाब की यूनियनिस्ट, कांग्रेस, अकाली कॉलिशन सरकार ने भी और नॉर्थवेस्टर्न फ्रंटियर प्रोविन्स की कांग्रेस सरकार ने भी उस क़त्लेआम की ख़बरों को दबाया ही था, ताकि उनके सूबों में बदअमनी फैलने से उनकी सरकारों को कोई ख़तरा न हो।

* 24 जनवरी को पंजाब सरकार मुस्लिम नेशनल गार्ड्स पर पाबन्दी लगा देती है। मुस्लिम नेशनल गार्ड्स के लाहौर में दफ़्तर की तलाशी के दौरान मुस्लिम लीग के रहनुमा तलाशी का विरोध करते हैं। उनको पुलिस ग्रिफ्तार कर लेती है।
अगले दिन 25 जनवरी को मुस्लिम लीग के लियाक़त अली ख़ान कहते हैं कि नेशनल गार्ड्स मुस्लिम लीग का ज़रूरी हिस्सा है और नेशनल गार्ड्स पर हमला मुस्लिम लीग पर हमला है। उसके अगले दिन 26 जनवरी को मुस्लिम लीग के लाहौर से ग्रिफ्तार किये गये रहनुमाओं पर से केस वापस ले लिये जाते हैं। दो दिन बाद, 28 जनवरी को नेशनल गार्ड्स पर चार दिन पहले लगाई गई पाबन्दी हटा ली जाती है।

* इसका क्या मतलब निकाला जाये? क्या यह मुस्लिम लीग की सियासी जीत नहीं थी? क्या इससे यह साबित नहीं होता था कि यूनियनिस्ट, कांग्रेस, अकाली कॉलिशन सरकार बहुत कमज़ोर थी?

* पंजाब में मिली सियासी जीत ही मुस्लिम लीग के लिये काफ़ी नहीं थी। वो अब एक ख़ूनी जंग जीतना चाहते थे।

* पोठोहार में मार्च, 1947 का हिन्दू-सिख क़त्लेआम पाकिस्तान बनने की तारीख़ की पहली ऐसी ख़ूनी जंग थी, जिसमें आल इण्डिया मुस्लिम लीग, मुस्लिम नेशनल फ्रंट, और उनके हिमायतियों को फ़तह मिली।

* 5 मार्च को रावलपिण्डी में भी हिन्दू और सिख स्टूडेंट्स ने जलूस निकाला। हिन्दू और सिख स्टूडेंट्स के इस जलूस पर पाकिस्तान बनाने के हिमायती लोगों ने हमला कर दिया। हिन्दू और सिख स्टूडेंट्स ने उनका मुकाबला किया। इस के बाद हमलावरों ने रावलपिंडी शहर के अंदरूनी हिस्से पर हमला कर दिया। रावलपिण्डी शहर में हिन्दुओं और सिखों पर हमले 3 दिन तक जारी रहे।

* 7 मार्च को रावलपिंडी ज़िले में तक्षिला रेल्वे स्टेशन पर एक रेलगाड़ी रोक कर हिन्दू और सिख मुसाफिरों को गाड़ी से बाहर निकाल कर क़त्ल कर दिया गया। यहाँ 22 हिन्दू और सिख क़त्ल किए गए।

* रावलपिण्डी के गाँव मुग़ल में 8 मार्च को हमला हुआ। दंगाइयों के लीडर काज़िम खान ने, जो कि ददोछा गाँव का था, क़ुरआन की कसम खायी कि सिखों को क़त्ल नहीं किया जायेगा, अगर वो सरेंडर कर दें। सिखों ने भी गोलियाँ ख़त्म होने की वजह से कोई और रास्ता न देखते हुये काज़िम खान की शर्त मान ली। जैसे ही सिख गुरुद्वारे से बाहर आये, दंगाइयों ने उनपर हमला करके उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। कुल 141 सिखों को क़त्ल कर दिया गया। इस गाँव के कुछ ही सिख बच पाये थे। गुरुद्वारा साहिब को जला दिया गया।

* 8 मार्च को ढोल बजाते हुये हज़ारों की तादाद में दंगाइयों की भीड़ ने अडियाला गाँव को घेर लिया। हिन्दुओं और सिखों को उनके घरों से निकाल-निकाल कर या तो ज़िन्दा ही जला दिया, या छुरे मार कर, या गोलियों से क़त्ल कर दिया गया। 40 हिन्दू और सिख अपनी जान बचाने के लिये मुसलमान बन गये।

* 8 मार्च को कहूटा में हुये क़त्लेआम में 60 के क़रीब हिन्दू, सिखों को क़त्ल किया गया। यहाँ बहुत बड़ी तादाद में औरतों को अग़वा किया गया।

* थोहा ख़ालसा जैसा ही एक हादसा बेमली गाँव मे 8 मार्च को हुआ, जहाँ कुछ सिखों ने अपनी औरतों और लड़किओं को हमलावरों के हाथों देने की बजाय ख़ुद ही क़त्ल कर दिया था। यहाँ तक़रीबन 80 सिखों का क़त्लेआम हुआ। 105 लोगों को अग़वा कर लिया गया।